पासपोर्ट-वीजा सेवाओं के ठेके पर दिल्ली हाईकोर्ट सख्त, चार भारतीय मिशनों के लिए नए टेंडर का आदेश
नई दिल्ली, 15 जुलाई (आईएएनएस)। दिल्ली हाईकोर्ट ने बुधवार को विदेश मंत्रालय द्वारा अबू धाबी (यूएई), कुवैत, सिंगापुर और कैनबरा (ऑस्ट्रेलिया) स्थित भारतीय मिशनों में कांसुलर, पासपोर्ट और वीजा (सीपीवी) सेवाओं के आउटसोर्सिंग के लिए अपनाई गई तकनीकी मूल्यांकन प्रक्रिया को रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि बोलीदाताओं का मूल्यांकन मनमाने, अतार्किक और अपारदर्शी तरीके से किया गया, जो संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है।
न्यायमूर्ति अनिल क्षेत्रपाल और न्यायमूर्ति शैल जैन की खंडपीठ ने ई ट्रैव टेक लिमिटेड और वेरासिस लिमिटेड की याचिकाओं पर यह फैसला सुनाया। दोनों कंपनियों ने तकनीकी बोली के चरण में अयोग्य घोषित किए जाने को चुनौती दी थी।
अदालत ने कहा कि सामान्यतः न्यायालय विशेषज्ञ समितियों द्वारा किए गए तकनीकी मूल्यांकन में हस्तक्षेप नहीं करता, लेकिन जब निर्णय प्रक्रिया मनमानी, अपारदर्शी और निष्पक्षता, पारदर्शिता तथा समानता के संवैधानिक सिद्धांतों के विपरीत हो, तब न्यायिक समीक्षा आवश्यक हो जाती है।
खंडपीठ ने कहा कि याचिकाकर्ताओं को दिए गए पैरामीटर-वार अंक मनमाने और तर्कहीन हैं। इसलिए तकनीकी मूल्यांकन संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत टिक नहीं सकता।
अदालत ने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर सरकार ने कंपनियों को पैरामीटर-वार अंक तो उपलब्ध करा दिए, लेकिन यह नहीं बताया कि अंक किस आधार पर दिए गए या किन कारणों से काटे गए।
फैसले में कहा गया कि मूल्यांकन पत्रकों में न तो याचिकाकर्ताओं के प्रस्तावों की कमियां दर्ज हैं और न ही यह स्पष्ट किया गया है कि प्रतिस्पर्धी कंपनियों की तुलना में उन्हें कम अंक क्यों दिए गए। इससे कंपनियां यह समझ ही नहीं सकीं कि उनके प्रस्ताव दूसरे प्रस्तावों से कैसे कमजोर माने गए।
दिल्ली हाईकोर्ट ने यह भी पाया कि अलग-अलग भारतीय मिशनों में लगभग समान प्रस्तावों और दस्तावेजों को अलग-अलग अंक दिए गए, जबकि ऐसा करने का कोई कारण रिकॉर्ड में दर्ज नहीं था। अदालत ने कहा कि समान सामग्री का समान मानदंडों पर मूल्यांकन होना निष्पक्ष और पारदर्शी टेंडर प्रक्रिया का अनिवार्य हिस्सा है।
केंद्र सरकार ने दलील दी थी कि यह मामला पहले ही तय हो चुका है और दोबारा सुनवाई नहीं हो सकती। हालांकि, अदालत ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि पैरामीटर-वार अंक सामने आने के बाद नया कारण उत्पन्न हुआ, इसलिए याचिकाएं सुनवाई योग्य हैं।
अदालत ने यह तर्क भी स्वीकार नहीं किया कि तकनीकी मूल्यांकन समिति के समक्ष मौखिक प्रस्तुति के दौरान बोली की कमियां बताई गई थीं। अदालत ने कहा कि यदि मूल्यांकन का आधार मौखिक प्रस्तुति थी, तो उसकी वजहें रिकॉर्ड में दर्ज होनी चाहिए थीं। केवल मौखिक दलीलें लिखित कारणों का विकल्प नहीं हो सकतीं।
हाईकोर्ट ने कहा कि मूल्यांकन प्रक्रिया में कारण दर्ज न करना सबसे बड़ी खामी है। यह सामान्य वित्तीय नियम (जीएफआर), 2017, टेंडर की शर्तों और निष्पक्ष प्रशासन के स्थापित सिद्धांतों का उल्लंघन है।
अदालत ने तकनीकी मूल्यांकन को रद्द करते हुए सफल निजी कंपनियों को दिए गए ठेके भी निरस्त कर दिए। साथ ही विदेश मंत्रालय और संबंधित भारतीय मिशनों को निर्देश दिया कि वे एक महीने के भीतर नए सिरे से रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल (आरएफपी) जारी करें और जल्द से जल्द नई टेंडर प्रक्रिया पूरी करें।
हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि नई निविदा प्रक्रिया पूरी होने तक वर्तमान सेवा प्रदाता अपना काम जारी रखेंगे, ताकि पासपोर्ट, वीजा और कांसुलर सेवाओं में आम लोगों को किसी तरह की परेशानी या व्यवधान का सामना न करना पड़े।
--आईएएनएस
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