तृणमूल के चुनाव चिह्न पर संकट और बंगाल उपचुनाव के नतीजे तय करेंगे ममता बनर्जी का सियासी भविष्य
नई दिल्ली, 14 सितंबर (आईएएनएस)। तृणमूल कांग्रेस की संस्थापक और पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अपने मौजूदा और पूर्व सहयोगियों के आग्रह और प्रोत्साहन के बावजूद अगले महीने होने वाले विधानसभा उपचुनावों में चुनाव न लड़ने का फैसला किया है। इस फैसले ने उनके व्यापक राजनीतिक हितों को लेकर चर्चाओं को फिर से हवा दे दी है।
इस साल भारतीय जनता पार्टी की जबरदस्त जीत के साथ उनका 15 साल का लगातार शासन खत्म हो गया, और उनके करीबी सहयोगी से कट्टर विरोधी बने सुवेंदु अधिकारी मुख्यमंत्री बन गए।
तब से, 71 वर्षीय नेता ने कई बार अपने संगठन को फिर से खड़ा करने और साथ ही विपक्षी इंडिया ब्लॉक को मजबूत करने की अपनी इच्छा दोहराई है, जिसमें भाजपा की विशाल ताकत के खिलाफ एकजुटता पर जोर दिया गया है।
दिलचस्प बात यह है कि अब उन्होंने अपने कट्टर प्रतिद्वंद्वी कम्युनिस्टों और कांग्रेस, जिससे वे 1998 में अलग हो गई थीं, की ओर गठबंधन का हाथ बढ़ाया है।
तृणमूल कांग्रेस के बंटवारे के बाद, ममता बनर्जी के नेतृत्व वाला गुट अब पार्टी के असली नाम और उसके 'दो फूलों' वाले लोगो (जिसे उन्होंने खुद बनाया था) को बनाए रखने के लिए रिताब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले प्रतिद्वंद्वी तृणमूल गुट के साथ कड़े संघर्ष में उलझा हुआ है।
पश्चिम बंगाल के राजनीतिक हलकों को पता है कि जमीनी स्तर पर पूर्व मुख्यमंत्री का कितना प्रभाव था, जिसके कारण 1977 से लगातार शासन कर रही लेफ्ट फ्रंट सरकार 2011 में गिर गई थी।
लेकिन अब, धोखाधड़ी, गबन, रिश्वतखोरी, जबरन वसूली और तस्करी के आरोपों ने तृणमूल कांग्रेस को घेर लिया है, जबकि सत्ता की होड़ में प्रतिद्वंद्वी गुट आपस में भिड़ रहे हैं।
हालांकि उन्होंने कभी-कभी सख्त रवैया भी दिखाया, जैसे पार्टी सदस्यों को सबके सामने डांटना, लीडरशिप कमेटियों को भंग करना और फिर से बनाना, लेकिन ज्यादातर उन्हें बेबस होकर यह देखते हुए देखा गया कि उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी संगठन का नियंत्रण संभाल रहे हैं।
पार्टी छोड़कर जाने वालों ने खुलकर और उनके गुट में अभी भी मौजूद लोगों ने दबी जबान से यह बात कही है।
उन्होंने यह भी माना था कि प्रशासन चलाने की जिम्मेदारी का शायद संगठन पर कुछ असर पड़ा है, और उन्होंने जमीनी स्तर से पार्टी को फिर से खड़ा करने का वादा किया।
साथ ही, ममता बनर्जी ने अपनी लड़ाई को व्यापक इंडिया ब्लॉक से जोड़ा है, 'इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल इंक्लूसिव अलायंस' (इंडिया) ब्लॉक का नामकरण करने का श्रेय उनके समर्थक उन्हें ही देते हैं।
हालांकि अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली आम आदमी पार्टी (आप) और एम.के. स्टालिन की द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) जैसी पार्टियों ने अब संबंध खत्म कर लिए हैं, लेकिन कुछ नेताओं का मानना है कि ममता के व्यक्तिगत संबंध उन्हें 2029 के लोकसभा चुनाव के लिए वापस आने के लिए मना सकते हैं। इस गठबंधन में शामिल कई लोग, जो कांग्रेस के नेतृत्व वाले मंच का विरोध करते हैं, ममता बनर्जी में एक ऐसा विकल्प देखते हैं जो शायद पूरे देश में मजबूत पकड़ बनाने के बजाय क्षेत्रीय राजनीति में ज्यादा सक्रिय रहेंगी।
लेकिन, कुछ जानकारों का कहना है कि 'इंडिया' गठबंधन को मजबूत करने पर ममता का जोर उनकी उस रणनीति को दिखाता है जिसके तहत वह खुद को विपक्ष की राष्ट्रीय नेता के तौर पर पेश करना चाहती हैं।
इस बीच, पश्चिम बंगाल में होने वाले उपचुनाव उनके गुट की ताकत और पार्टी में नई जान फूंकने या कोई राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा पूरी करने की उनकी क्षमता की एक अहम परीक्षा होंगे।
पश्चिम बंगाल में रेजीनगर और नंदीग्राम विधानसभा सीटों पर 6 अक्टूबर को उपचुनाव होंगे। इन सीटों पर जीतने वाले हुमायूं कबीर और मौजूदा मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने अपनी-अपनी सीटों से इस्तीफा दे दिया था।
जहां कबीर ने नौदा सीट अपने पास रखने का फैसला किया, वहीं अधिकारी ने भवानीपुर का प्रतिनिधित्व करने का विकल्प चुना। भवानीपुर में उन्होंने अपनी पूर्ववर्ती और कभी उनकी मेंटर रहीं ममता बनर्जी को 15,000 से ज्यादा वोटों से हराया था, जबकि तृणमूल कांग्रेस के दूसरे नंबर पर रहे पवित्र कर के खिलाफ उनकी जीत का अंतर 10,000 वोटों से भी कम था।
कबीर ने ममता बनर्जी को रेजीनगर से चुनाव लड़ने का 'न्योता' दिया था और दावा किया था कि वह इस सीट से उनकी जीत पक्की कर सकते हैं। वहीं, रिताब्रता के नेतृत्व वाले गुट के नेताओं ने जोर देकर कहा कि अगर ममता खुद चुनाव लड़ती हैं तो वे नंदीग्राम में कोई उम्मीदवार नहीं उतारेंगे।
अपनी 'आम जनता उन्नयन पार्टी' (एजेयूपी) का प्रतिनिधित्व करते हुए कबीर ने रेजीनगर सीट 58,000 से ज्यादा वोटों के अंतर से जीती और कुल वोटों का 51.62 प्रतिशत हासिल किया।
नौदा में जीत का अंतर 28,000 वोटों से कम था, जहां एजेयूपी प्रमुख को कुल वोटों का लगभग 39 प्रतिशत ही मिला।
दिलचस्प बात यह है कि ये दोनों सीटें मुर्शिदाबाद जिले में हैं, जहां मुसलमानों की आबादी कुल आबादी का लगभग 70 प्रतिशत है। इसके बावजूद, भापजा दूसरे स्थान पर रही और तृणमूल तीसरे स्थान पर खिसक गई, जो इस बार दिखे ध्रुवीकरण को दर्शाता है।
इस बदलाव के बीच, ममता के नेतृत्व वाला तृणमूल गुट अब पार्टी के चुनाव चिह्न और विपक्ष की एकता के लिए उनकी लड़ाई को बड़े 'इंडिया' गठबंधन से जोड़कर देख रहा है। उनका कहना है कि एक बार जब ममता अपनी पार्टी पर पूरी तरह नियंत्रण हासिल कर लेंगी, तो बीजेपी के दबदबे का मुकाबला करने के लिए विपक्ष की एकजुटता ज़रूरी होगी।
--आईएएनएस
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