केरल में मजबूत एंटी-इंकम्बेंसी के बीच यूडीएफ की निर्णायक जीत को लेकर कांग्रेस आश्वस्त: शशि थरूर (आईएएनएस साक्षात्कार)
तिरुवनंतपुरम, 7 अप्रैल (आईएएनएस) वरिष्ठ कांग्रेस नेता शशि थरूर ने केरल चुनावों में यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) की संभावनाओं को लेकर पूरा भरोसा जताया है। उन्होंने गठबंधन के लिए स्पष्ट जीत का अनुमान व्यक्त किया और राज्य में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के प्रभाव को कमतर आंका।
आईएएनएस के साथ एक विस्तृत बातचीत में उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चुनाव प्रचार, शासन से जुड़े मुद्दों, राष्ट्रीय नीति बहसों और वैश्विक संघर्षों पर भारत के कूटनीतिक रुख पर भी अपने विचार साझा किए।
सवाल: केरल चुनावों को लेकर आपकी क्या राय है? क्या यह कांग्रेस के लिए आसान जीत है या मुकाबला कड़ा है?
जवाब: मैं कहूंगा कि जब 9 अप्रैल को लोग वोट करेंगे और 4 मई को मतगणना होगी, तो हम यूडीएफ की एक बेहद स्पष्ट जीत देखने जा रहे हैं। मैं एक साफ-सुथरी जीत की उम्मीद कर रहा हूं। मैंने 14 में से 12 जिलों की 59 विधानसभा सीटों का दौरा किया है। काश मैं सभी 14 जिलों को कवर कर पाता, लेकिन दुर्भाग्य से चुनाव आयोग ने इस सीमित प्रचार अवधि में हमें पर्याप्त समय नहीं दिया। फिर भी, जो मैंने देखा है, उसमें हमारे उम्मीदवारों के लिए जबरदस्त उत्साह और समर्थन है, और राज्य में बदलाव की लगभग सार्वभौमिक इच्छा नजर आ रही है।
सवाल: प्रधानमंत्री केरल में काफी समय दे रहे हैं और कई रैलियां कर रहे हैं। उनके जनाधार को आप कैसे देखते हैं?
जवाब: मुझे लगता है कि प्रधानमंत्री अपना समय बर्बाद कर रहे हैं, क्योंकि लोग जानते हैं कि वे यहां आकर मुख्यमंत्री नहीं बनने वाले हैं। भाजपा को संसदीय स्तर पर जो थोड़े-बहुत लाभ मिल सकते हैं, उनका राज्य की सरकार तय करने में कोई खास महत्व नहीं है। केरल में भाजपा लगभग शून्य सीटों वाली पार्टी है। अगर वह शून्य से बढ़कर एक, दो या अधिकतम तीन सीटें भी हासिल कर ले, तो भी शासन पर उसका कोई खास असर नहीं पड़ेगा। मेरा मानना है कि एंटी-इंकम्बेंसी फैक्टर वास्तविक है और जो मतदाता बदलाव चाहते हैं, उन्हें भाजपा को वोट देकर अपना वोट व्यर्थ नहीं करना चाहिए। उन्हें यूडीएफ का समर्थन करना चाहिए ताकि हम एक मजबूत और प्रभावी सरकार बना सकें।
सवाल: सत्तारूढ़ दल (एलडीएफ) को वायनाड जैसे मुद्दों पर कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। इस पर आपकी प्रतिक्रिया?
जवाब: जहां तक वायनाड के मुद्दे का सवाल है, हमें याद रखना चाहिए कि जब कोई आपदा आती है, तो जिम्मेदारी सत्तारूढ़ सरकार की होती है। उनके पास मुख्यमंत्री राहत कोष, राष्ट्रीय आपदा सहायता और प्रधानमंत्री राहत कोष जैसे संसाधन उपलब्ध होते हैं। ऐसे में यह पूछना जरूरी है कि उन्होंने क्या किया, उनकी जवाबदेही क्या है और उन्होंने लोगों को क्या दिया। विपक्ष ने भी मदद के लिए आगे बढ़कर काम किया है, जो सराहनीय है। यह जनसेवा और परोपकार का उदाहरण है, लेकिन आपदा पीड़ितों के लिए घर बनाना विपक्ष की कानूनी जिम्मेदारी नहीं होती। इसके बावजूद कांग्रेस और इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग ने यह काम किया है, जो प्रशंसा के योग्य है।
सवाल: प्रधानमंत्री ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ और यूनिफॉर्म सिविल कोड की वकालत कर रहे हैं। इस पर आपका क्या रुख है?
जवाब: ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ प्रधानमंत्री का एक दिलचस्प प्रस्ताव है। इसमें स्वाभाविक रूप से कुछ भी गलत नहीं है, यह कुशल भी लग सकता है। दरअसल, भारत में 1952 से 1967 के बीच यह व्यवस्था रही भी है। लेकिन यह ज्यादा समय तक नहीं चल सकी, क्योंकि हमारा संसदीय सिस्टम ऐसा है जहां सरकारें विधायी बहुमत पर निर्भर करती हैं। अगर सरकार बहुमत खो देती है या गठबंधन टूट जाता है, तो सरकार गिर जाती है और अधिकतम छह महीने के भीतर चुनाव कराना पड़ता है। इससे कोई तय चक्र संभव नहीं रह जाता। 1967 के बाद अलग-अलग समय पर सरकारें गिरती रहीं, इसलिए अब देश में लगभग हर साल कहीं न कहीं चुनाव होते रहते हैं। प्रधानमंत्री इस मुद्दे को ऐसे देख रहे हैं जैसे भारत में राष्ट्रपति प्रणाली हो, जहां तय कार्यकाल संभव होता है। लेकिन संसदीय प्रणाली में दोनों चीजें साथ-साथ नहीं चल सकतीं, आपको एक को चुनना होगा।
सवाल: पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध को भारत ने किस तरह संभाला है? क्या राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता दी गई है?
जवाब: पश्चिम एशिया का यह संघर्ष, खासकर ईरान से जुड़ा, सिर्फ सीधे तौर पर शामिल देशों को ही नहीं बल्कि दूर बैठे देशों को भी प्रभावित कर रहा है। भारत जैसे देश, जो स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर तेल, गैस, एलपीजी और अन्य जरूरी संसाधनों के लिए निर्भर हैं, उन्हें इसका सीधा असर झेलना पड़ रहा है। ईंधन के अलावा उर्वरक, हीलियम और अन्य महत्वपूर्ण तत्वों पर भी इसका प्रभाव पड़ता है, जो हमारी अर्थव्यवस्था के लिए जरूरी हैं। जब तक यह संघर्ष जारी रहेगा, पूरी दुनिया प्रभावित होती रहेगी। इसलिए भारत का रुख स्पष्ट रूप से शांति के पक्ष में होना चाहिए। मैं लगातार कहता रहा हूं कि भारत को इस मुद्दे पर और मजबूत आवाज उठानी चाहिए और उन सभी देशों की ओर से बोलना चाहिए जो इस संघर्ष से प्रभावित हो रहे हैं।
सवाल: प्रधानमंत्री ने ईरान, इजरायल और खाड़ी देशों के नेताओं से बातचीत की है। आप उनके इस दृष्टिकोण को कैसे देखते हैं?
जवाब: अगर प्रधानमंत्री ने इन नेताओं से बातचीत की है, तो यह निश्चित रूप से एक सकारात्मक कदम है। लेकिन संवाद का परिणाम भी दिखना चाहिए। अगला कदम यह होना चाहिए कि वे सार्वजनिक या निजी या दोनों तरह से क्षेत्र और प्रभावित देशों की ओर से शांति और तनाव कम करने की अपील करें।
सवाल: अगर आपको केरल का मुख्यमंत्री बनने का प्रस्ताव मिले, तो क्या आप इसे स्वीकार करेंगे?
जवाब: यह पूरी तरह काल्पनिक सवाल है और ऐसा होने वाला नहीं है। कांग्रेस पार्टी में एक स्पष्ट प्रक्रिया है, चुनाव परिणाम के बाद निर्वाचित विधायक विचार-विमर्श करते हैं और नेतृत्व फैसला लेता है। मैं इस पद का उम्मीदवार नहीं हूं और न ही मुझे इसकी कोई अपेक्षा है। हालांकि, कई वरिष्ठ नेता मुझसे सलाह और संपर्क के लिए जुड़ते हैं, और जो भी मुख्यमंत्री बनेगा, अगर वह मेरी सहायता चाहता है, तो मैं हमेशा उपलब्ध रहूंगा।
--आईएएनएस
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