केरल के चुनावी नतीजों से पहले कांग्रेस में सीएम चेहरे को लेकर घमासान
तिरुवनंतपुरम, 24 अप्रैल (आईएएनएस)। केरल में चुनाव नतीजों से पहले ही सियासी हलचल तेज हो गई है, लेकिन इस बार मुकाबला विपक्ष और सत्तारूढ़ दल के बीच नहीं बल्कि कांग्रेस के अंदर ही देखने को मिल रहा है। कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) खेमे में मुख्यमंत्री पद को लेकर उठ रही चर्चाओं ने पार्टी की मुश्किलें बढ़ा दी हैं।
9 अप्रैल को मतदान संपन्न हो चुका है और नतीजे 4 मई को आने हैं। करीब एक दशक बाद सत्ता में वापसी की उम्मीद से उत्साहित यूडीएफ अब अंदरूनी खींचतान से जूझ रहा है।
दरअसल, केरल की राजनीति में लंबे समय से सत्ता बदलने का एक तय पैटर्न रहा है लेकिन 2021 में सीपीआई(एम) के नेतृत्व वाले वाम मोर्चे ने दोबारा सत्ता में आकर इस परंपरा को तोड़ दिया था। ऐसे में इस बार मुकाबला और भी अहम हो गया है।
इसी बीच कांग्रेस के अंदर मुख्यमंत्री पद को लेकर खुलकर दावेदारी शुरू हो गई है। वरिष्ठ नेता रमेश चेन्निथला, वीडी सतीशन और केसी वेणुगोपाल के समर्थक सार्वजनिक तौर पर अपने-अपने नेता को मुख्यमंत्री बनाने की मांग कर रहे हैं।
इस समय से पहले शुरू हुई इस दौड़ ने पार्टी को असहज स्थिति में डाल दिया है और भीतर-बाहर दोनों तरफ से आलोचना भी तेज हो गई है। वरिष्ठ मीडिया आलोचक एमएन करास्सेरी ने इसे शर्मनाक बताते हुए कहा कि इस तरह की खुली महत्वाकांक्षा मतदाताओं के भरोसे को कमजोर कर सकती है।
इस विवाद का असर अब सहयोगी दलों पर भी दिखने लगा है। इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के नेता और विधायक पी. अब्दुल हमीद ने कांग्रेस की कड़ी आलोचना की है। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री पद को लेकर इस तरह की चर्चा सामने नहीं आनी चाहिए थी।
अब्दुल हमीद ने चेतावनी दी कि यह बहस उन मतदाताओं को निराश कर सकती है जिन्होंने यूडीएफ को वोट दिया है और इससे जमीनी कार्यकर्ताओं का मनोबल भी टूट सकता है, जो लंबे समय से विपक्ष में रहकर संघर्ष कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि जिन नेताओं को इस तरह की चर्चाओं को रोकना चाहिए था, वही इसे बढ़ावा दे रहे हैं।
उन्होंने भरोसा जताया कि पार्टी हाईकमान जो भी फैसला लेगा, उसे सभी मानेंगे और राहुल गांधी केरल की राजनीति को अच्छी तरह समझते हैं।
दूसरी ओर, वाम दलों ने इस मुद्दे पर चुप्पी साध रखी है और एकजुटता का संदेश देने की कोशिश की है। इसके विपरीत, कांग्रेस में गुटबाजी एक बार फिर खुलकर सामने आ गई है, जिससे कार्यकर्ताओं और सहयोगियों में असहजता बढ़ रही है।
सत्ता मिलने के बाद कांग्रेस में नेतृत्व को लेकर विवाद होते रहे हैं। 2001 में बड़ी जीत के बाद एके एंटनी के मुख्यमंत्री बनने पर के. करुणाकरण और उनके खेमे के बीच बड़ा टकराव देखने को मिला था।
--आईएएनएस
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