Aapka Rajasthan

जलवायु परिवर्तन सिर्फ पर्यावरण नहीं, आजीविका और सामाजिक न्याय का भी संकट: विशेषज्ञ

नई दिल्ली, 8 अक्टूबर (आईएएनएस)। जलवायु परिवर्तन केवल पर्यावरणीय संकट नहीं है, बल्कि यह आजीविका, संसाधनों तक पहुंच, प्रतिनिधित्व और शक्ति संतुलन से जुड़ा एक व्यापक सामाजिक और आर्थिक संकट भी है। विशेषज्ञों ने बुधवार को इस बात पर जोर देते हुए कहा कि जलवायु नीतियों और विकास कार्यक्रमों में जेंडर दृष्टिकोण को केंद्र में रखा जाना चाहिए।
 

नई दिल्ली, 8 अक्टूबर (आईएएनएस)। जलवायु परिवर्तन केवल पर्यावरणीय संकट नहीं है, बल्कि यह आजीविका, संसाधनों तक पहुंच, प्रतिनिधित्व और शक्ति संतुलन से जुड़ा एक व्यापक सामाजिक और आर्थिक संकट भी है। विशेषज्ञों ने बुधवार को इस बात पर जोर देते हुए कहा कि जलवायु नीतियों और विकास कार्यक्रमों में जेंडर दृष्टिकोण को केंद्र में रखा जाना चाहिए।

राष्ट्रीय राजधानी में चिंतन रिसर्च फाउंडेशन (सीआरएफ) ने 'जेंडरिंग क्लाइमेट फ्यूचर्स: गर्म होती दुनिया में सत्ता, वित्त और न्याय' शीर्षक से एक नई पुस्तक का विमोचन किया। इस अवसर पर आयोजित चर्चा में जलवायु परिवर्तन और लैंगिक असमानता के बीच संबंधों पर विस्तार से विचार-विमर्श किया गया।

सीआरएफ के अध्यक्ष शिशिर प्रियदर्शी ने कहा कि जलवायु परिवर्तन का प्रभाव महिलाओं पर अनुपातहीन रूप से अधिक पड़ता है। इसके कारण महिलाओं की आजीविका और शिक्षा दोनों प्रभावित होती हैं। उन्होंने कहा कि महिलाओं के लिए भूमि स्वामित्व अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे उन्हें ऋण, वित्तीय सहायता और जलवायु-अनुकूल निवेश तक पहुंच प्राप्त करने में मदद मिलती है।

उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि जलवायु नीति में जेंडर को एक पूरक विषय के रूप में नहीं बल्कि एक केंद्रीय तत्व के रूप में देखा जाना चाहिए, क्योंकि इससे यह समझने में मदद मिलती है कि संवेदनशीलता, अनुकूलन और न्याय के मुद्दे किस प्रकार प्रभावित होते हैं।

कल्याणी शुक्ला और सैंड्रा कुरियन द्वारा संपादित इस पुस्तक में दक्षिण एशिया और भारत पर विशेष ध्यान देते हुए जेंडर एवं जलवायु परिवर्तन के विभिन्न पहलुओं का अध्ययन किया गया है। इसमें संवेदनशीलता, संसाधनों तक पहुंच, निर्णय लेने की क्षमता, जलवायु वित्त और न्यायपूर्ण संक्रमण जैसे मुद्दों को शामिल किया गया है।

पुस्तक में नीति विश्लेषण, केस स्टडी, फेमिनिस्ट पॉलिटिकल इकोलॉजी, जमीनी स्तर के अनुभव और मात्रात्मक शोध सहित विभिन्न दृष्टिकोणों को शामिल किया गया है।

चर्चा के दौरान वक्ताओं ने कहा कि जलवायु परिवर्तन के प्रभाव महिलाओं पर असमान रूप से पड़ते हैं और इस स्थिति से निपटने के लिए महिलाओं की भूमि, वित्त, तकनीक, डेटा और सामाजिक सुरक्षा तक पहुंच को मजबूत बनाना आवश्यक है।

विशेषज्ञों ने यह भी कहा कि जलवायु और रोजगार नीतियों में जेंडर दृष्टिकोण को मुख्यधारा में लाने के सामने संस्थागत बाधाएं मौजूद हैं। विभिन्न विभागों और हितधारकों के बीच समन्वय की कमी भी एक प्रमुख चुनौती के रूप में सामने आई।

चर्चा में यह भी रेखांकित किया गया कि जेंडर आधारित आंकड़ों की उपलब्धता बढ़ाना बेहद जरूरी है। इससे जलवायु परिवर्तन के आर्थिक और सामाजिक प्रभावों को बेहतर तरीके से समझा जा सकेगा और प्रभावी नीतियां तैयार करने में मदद मिलेगी।

पैनलिस्टों ने जोर देकर कहा कि जलवायु और विकास कार्यक्रमों की डिजाइनिंग के शुरुआती चरण से ही जेंडर संबंधी पहलुओं को शामिल किया जाना चाहिए। उन्हें बाद में जोड़ने के बजाय योजना निर्माण का अभिन्न हिस्सा बनाया जाना चाहिए।

विशेषज्ञों ने यह भी सुझाव दिया कि जटिल शोध और आंकड़ों को आम जनता और नीति निर्माताओं के लिए अधिक सरल, प्रासंगिक और उपयोगी संदेशों में परिवर्तित करने के लिए संवाद और संचार रणनीतियों को मजबूत करना होगा।

इस चर्चा का संचालन टेरी की वरिष्ठ फेलो डॉ. मिनी गोविंदन ने किया। पैनल में आरती आहूजा (पूर्व श्रम एवं रोजगार सचिव), डॉ. निखिल राज, पिंकी प्रधान और डॉ. अदिति कपूर सहित विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञ शामिल थे।

--आईएएनएस

डीबीपी