सदियों पुरानी 'केर पूजा' आदिवासी और गैर-आदिवासी सद्भाव और कल्याण का प्रतीक : सीएम साहा
अगरतला, 4 अगस्त (आईएएनएस)। त्रिपुरा के मुख्यमंत्री माणिक साहा ने मंगलवार को कहा कि राज्य की सदियों पुरानी पारंपरिक 'केर पूजा' आदिवासी और गैर-आदिवासी समुदायों के बीच आस्था, एकता और सद्भाव का प्रतीक है। यह त्रिपुरा की समृद्ध सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत को भी दर्शाती है।
मुख्यमंत्री ने भाजपा के राज्य अध्यक्ष अभिषेक देबरॉय, पश्चिम त्रिपुरा जिला मजिस्ट्रेट विशाल कुमार और अन्य गणमान्य लोगों के साथ मिलकर अगरतला के ऐतिहासिक उज्जयंत पैलेस में 'केर पूजा' देखी। यह त्योहार से जुड़ी पुरानी परंपराओं के अनुसार, पूजा के लिए तय की गई जगह के बाहर से देखी गई।
सदियों पुराने इस त्योहार को देखने के बाद, जो राज्य भर के आदिवासी इलाकों में भी मनाया जाता है, साहा ने मीडिया से कहा, "केर पूजा के इस शुभ अवसर पर मुझे आशीर्वाद पाने का मौका मिला।"
केर पूजा की परंपराओं के अनुसार, पूजा के दौरान बाहरी लोगों को पूजा के लिए तय की गई जगह में जाने की इजाजत नहीं होती है। यह त्योहार अगरतला, त्रिपुरा के अलग-अलग हिस्सों, कुछ अन्य पूर्वोत्तर राज्यों और पड़ोसी बांग्लादेश के चटगांव पहाड़ी इलाकों में भी मनाया जाता है।
त्योहार से जुड़े कड़े पारंपरिक नियमों के तहत, पूजा खत्म होने तक तय पूजा क्षेत्र के अंदर जन्म, मृत्यु और मनोरंजन जैसी गतिविधियां मना होती हैं।
मुख्य रूप से स्थानीय आदिवासी समुदायों द्वारा आयोजित सालाना केर पूजा में लोगों की भलाई, जमीन की सुरक्षा और बुरी आत्माओं व नकारात्मक ताकतों को दूर रखने के लिए जटिल और पुरानी परंपराओं के अनुसार पूजा-पाठ किया जाता है।
ढाई दिन तक चलने वाली केर पूजा, सात दिन की 'खारची पूजा' खत्म होने के लगभग एक सप्ताह बाद मनाई जाती है। खारची पूजा के दौरान त्रिपुरा के 14 हिंदू देवी-देवताओं की एक साथ पूजा की जाती है।
इस साल एक सप्ताह तक चलने वाली खारची पूजा अगरतला से लगभग आठ किलोमीटर उत्तर में स्थित पुराने रियासती राज्य की पूर्व राजधानी 'पुरान हवेली' (जिसे अब खैरपुर के नाम से जाना जाता है) में आयोजित की गई थी।
मुख्यमंत्री ने कहा कि केर पूजा का एक मुख्य मकसद समाज के सभी वर्गों के बीच सद्भावना, एकता और भाईचारे की भावना को बढ़ावा देना है। पारंपरिक केर पूजा के अवसर पर, मैं त्रिपुरा के सभी लोगों को दिल से बधाई और शुभकामनाएं देता हूं। हम सभी जानते हैं कि केर पूजा, खैरपुर के चतुर्दश देवता मंदिर में आयोजित खारची पूजा के सात दिन बाद मनाई जाती है। यह पारंपरिक त्योहार पुराने राजा महाराजा त्रिलोचन के शासनकाल में शुरू हुआ था।
उन्होंने आगे कहा कि पूजा-पाठ से जुड़ी रस्में लंबे समय से चली आ रही परंपराओं के अनुसार ही की जाती हैं। हालांकि अब पूजा शाही महल के सामने होती है, लेकिन पहले पूरा महल परिसर पवित्र 'केर' सीमा के अंदर आता था। साहा ने कहा, "चतुर्दश देवता मंदिर में 14 देवताओं की पूजा करने वाले पुजारी रस्में निभाने आए हैं। हमें उनका आशीर्वाद मिला है। यह पूजा राज्य के विकास, शांति और सभी की भलाई के लिए की जाती है।"
उन्होंने यह भी बताया कि रस्मों के हिस्से के तौर पर बांस के एक प्रतीकात्मक ढांचे की पूजा होती है।
मुख्यमंत्री ने 'एक्स' पर लिखा, "त्रिपुरा की पारंपरिक केर पूजा के मौके पर मैं राज्य के लोगों को दिल से बधाई और शुभकामनाएं देता हूं। केर पूजा हमारी समृद्ध विरासत, संस्कृति और आध्यात्मिक मान्यताओं का एक अनूठा प्रतीक है। मेरी प्रार्थना है कि यह पवित्र त्योहार सभी के जीवन में शांति, अच्छा स्वास्थ्य और समृद्धि लाए।"
--आईएएनएस
एससीएच/एबीएम
