Aapka Rajasthan

शिवसेना ने बच्चू कडू की ‘जीवित समाधि’ को बताया राजनीतिक अवसरवाद, शिंदे गुट में जाने पर उठाए सवाल

मुंबई, 2 मई (आईएएनएस)। शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) ने शनिवार को महाराष्ट्र के मौजूदा राजनीतिक हालात की कड़ी आलोचना की। इस दौरान पार्टी ने पूर्व विधायक और पूर्व मंत्री बच्चू कडू की “जीवित समाधि” (स्वेच्छा से संन्यास) के मुद्दे को प्रमुखता से उठाया।
 
शिवसेना ने बच्चू कडू की ‘जीवित समाधि’ को बताया राजनीतिक अवसरवाद, शिंदे गुट में जाने पर उठाए सवाल

मुंबई, 2 मई (आईएएनएस)। शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) ने शनिवार को महाराष्ट्र के मौजूदा राजनीतिक हालात की कड़ी आलोचना की। इस दौरान पार्टी ने पूर्व विधायक और पूर्व मंत्री बच्चू कडू की “जीवित समाधि” (स्वेच्छा से संन्यास) के मुद्दे को प्रमुखता से उठाया।

इसने कडू के हाल ही में एकनाथ शिंदे गुट के साथ जुड़ने को समाज सेवा के नाम पर राजनीतिक अवसरवाद का एक नाटकीय उदाहरण बताया।

ठाकरे गुट ने अपने मुखपत्र ‘सामना’ में एक संपादकीय में कहा कि “समाधि समारोह” में उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे, उनके समर्थक और बच्चू कडू शामिल हुए थे। इस प्रतीकात्मक कार्यक्रम के बाद कडू को शिंदे ने विधान परिषद के लिए नामित कर दिया। कडू, जो अपनी विधानसभा सीट गंवाने के बाद से राजनीतिक रूप से असहज स्थिति में थे, इस नियुक्ति के बाद अपना राजनीतिक भविष्य सुरक्षित होने से राहत महसूस करते नजर आए।

यह संपादकीय कडू के एक सामाजिक कार्यकर्ता से एक पेशेवर राजनेता बनने तक के सफर को दर्शाता है। वे मूल रूप से शिवसेना से जुड़े थे, लेकिन जब उन्हें चुनाव लड़ने का टिकट नहीं मिला, तो उन्होंने पार्टी छोड़ दी और निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा।

बाद में उन्होंने उद्धव ठाकरे के मंत्रिमंडल में मंत्री के रूप में भी काम किया, लेकिन बगावत के दौरान वे पक्ष बदलकर सूरत, गुवाहाटी और गोवा की राजनीतिक गतिविधियों में शामिल हो गए। नई सरकार में मंत्री पद न मिलने पर उन्होंने फिर से विरोध करना शुरू कर दिया, लेकिन अंत में जब उनकी विधायक सीट खतरे में पड़ी, तो वे शिंदे गुट में शामिल हो गए।

संपादकीय में कडू के हालिया कार्यों में मौजूद विरोधाभास को उजागर किया गया है। शामिल होने से कुछ दिन पहले उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा था, “हम इतने भी कमजोर नहीं हैं कि सिर्फ एक विधायक पद के लिए शिंदे के साथ चले जाएं।”

आज के संपादकीय में कहा गया है कि कडू अब “शिंदे-निवासी” बन गए हैं। इसमें आगे लिखा गया है कि अमरावती में बच्चू कडू और रवि राणा के बीच टकराव चल रहा है। इन दोनों के बीच का यह संघर्ष जनता को भ्रमित करने का एक तरीका है। जब राज्य विधानसभा चुनावों में भाजपा ने निर्दलीय उम्मीदवार रवि राणा के नामांकन का समर्थन किया था, तो कडू ने इसे मजबूरी बताते हुए आलोचना की थी। ऐसे में संपादकीय में सवाल उठाया गया है कि कडू के हालिया कदम को किस तरह देखा जाना चाहिए।

संपादकीय में कहा गया है कि कडू की “समाधि” एक तरह का दिखावा है और यह हमारी राजनीति की गिरती हुई स्थिति का एक स्पष्ट उदाहरण है।

उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना का कहना है कि भाजपा भविष्य के चुनाव अकेले लड़ने की योजना बना रही है। उनका मानना है कि भाजपा का साथ देने वाले सहयोगी दलों की भूमिका अब कम होती जा रही है और पार्टी आगे बढ़ने के लिए उन्हें किनारे कर सकती है। शिवसेना का यह भी दावा है कि अजित पवार और एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले दलों को लेकर राजनीतिक समीकरण बदल सकते हैं और उनके विधायकों के भविष्य को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है।

संपादकीय में कहा गया है कि जब शिंदे का प्रभाव कम हो जाएगा, तो कडू जैसे नेता अपनी मौजूदा स्थिति बदलकर भाजपा के साथ जुड़ सकते हैं। इसमें यह भी कहा गया है कि काडू मुख्यमंत्री फडणवीस और प्रधानमंत्री मोदी की तारीफ करते हुए दिव्यांगों के अधिकारों के नाम पर भाजपा के साथ बने रहने की कोशिश कर सकते हैं।

संपादकीय के अनुसार काडू की “समाधि” एक दिखावा है और यह राजनीति के गिरते स्तर को दर्शाती है। इसमें यह भी दावा किया गया है कि जहां कडू विधान परिषद के जरिए अपने राजनीतिक भविष्य को सुरक्षित करने की कोशिश कर रहे हैं। वहीं जिन किसानों, विधवाओं और दिव्यांग लोगों के हितों की वे बात करते हैं, उनकी स्थिति अभी जस की तस बनी हुई है और वे उपेक्षित हैं।

--आईएएनएस

एसएचके/वीसी