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नेपाल में ग्लेशियल झीलें फटने का खतरा बढ़ा, 47 लेक्स से कभी भी आ सकती है तबाही

काठमांडू, 27 अगस्त (आईएएनएस)। इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (आईसीआईएमओडी) और नेपाल सरकार के वैज्ञानिक आकलनों के अनुसार, 47 ग्लेशियल झीलों को 'संभावित रूप से खतरनाक ग्लेशियल झीलें' (पीडीजीएलएस) के रूप में चिन्हित किया गया है। चेतावनी दी गई है कि इन झीलों से कभी भी ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (ग्लोफ) आ सकता है, जो नेपाल की नदी प्रणालियों में विनाशकारी बाढ़ का कारण बन सकता है।
 

काठमांडू, 27 अगस्त (आईएएनएस)। इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (आईसीआईएमओडी) और नेपाल सरकार के वैज्ञानिक आकलनों के अनुसार, 47 ग्लेशियल झीलों को 'संभावित रूप से खतरनाक ग्लेशियल झीलें' (पीडीजीएलएस) के रूप में चिन्हित किया गया है। चेतावनी दी गई है कि इन झीलों से कभी भी ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (ग्लोफ) आ सकता है, जो नेपाल की नदी प्रणालियों में विनाशकारी बाढ़ का कारण बन सकता है।

इन 47 झीलों में से 21 नेपाल में स्थित हैं, जबकि 25 झीलें तिब्बत में हैं और सीमा पार की श्रेणी में आती हैं। ये झीलें उन नदियों के ऊपरी हिस्से में स्थित हैं जो दक्षिण की ओर बहते हुए नेपाल में प्रवेश करती हैं, इसलिए ये नीचे बसे समुदायों और बुनियादी ढांचे के लिए संभावित खतरा पैदा करती हैं।

इस पूरी सूची में से आपदा प्रबंधन अधिकारियों और संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) ने कुछ तेजी से फैल रही, मोरेन (पत्थर और मलबे) से बनी बांधनुमा झीलों को विशेष रूप से चिन्हित किया है। इनके जोखिम को कम करने और जलस्तर घटाने के लिए तत्काल कदम उठाने की जरूरत बताई गई है।

इनमें सबसे प्रमुख झीलें लोअर बरुण (टैलोपोखरी), थुलागी (डोना), लुमडिंग त्सो, होंगु-2/चामलांग साउथ, त्सो रोल्पा और इमजा त्सो हैं।

इन उच्च जोखिम वाली झीलों से पैदा होने वाला खतरा मुख्य रूप से उन पर्वतीय और पहाड़ी जिलों में केंद्रित हैं, जो नीचे की ओर बहने वाली नदी घाटियों के रास्ते में स्थित हैं। यदि कोई बड़ा 'ग्लोफ' होता है, तो इन क्षेत्रों के लोगों और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे को गंभीर नुकसान पहुंच सकता है।

पूर्वी और मध्य नेपाल, जिनमें कोशी और बागमती नदी बेसिन शामिल हैं, वहां कुल क्षेत्रीय जोखिम का 85 प्रतिशत से अधिक हिस्सा संवेदनशील क्षेत्रों में केंद्रित है।

सबसे अधिक जोखिम वाले जिलों में सोलुखुम्बु शामिल है, जहां दूध कोसी और इमजा बेसिन आते हैं। संखुवासभा जिला बरुण और अरुण नदी घाटियों के किनारे स्थित है। दोलखा जिला तामा कोशी नदी कॉरिडोर में है और त्सो रोल्पा झील से खतरे का सामना कर सकता है। वहीं सिंधुपालचोक जिला भोटे कोसी और सुन कोसी नदी घाटियों के किनारे स्थित है और तिब्बत की सीमा पार स्थित झीलों से आने वाली संभावित बाढ़ के खतरे में है।

इसके अलावा, रामेछाप, काव्रेपलानचोक और रसुवा जिलों की नदी किनारे बसी बस्तियां भी संवेदनशील मानी जाती हैं, खासकर त्रिशूली नदी बेसिन के आसपास के इलाके।

पश्चिमी और सुदूर-पश्चिमी नेपाल में, जहां गंडकी और कर्णाली नदी बेसिन फैले हुए हैं, कई जिलों के समुदायों और जलविद्युत परियोजनाओं पर भी सीधा खतरा मंडरा रहा है।

इनमें मनांग और लमजुंग जिले शामिल हैं, जो थुलागी झील के नीचे मार्स्यांगदी नदी बेसिन में स्थित हैं। इसके अलावा, गोरखा जिला बूढ़ी गंडकी बेसिन में, मुस्तांग और म्याग्दी जिले काली गंडकी बेसिन में, तथा हुम्ला के दूरदराज के इलाके, जिनमें लिमी घाटी और हुम्ला कर्णाली कॉरिडोर शामिल हैं, भी संभावित रूप से प्रभावित हो सकते हैं।

--आईएएनएस

एवाई/डीकेपी