Aapka Rajasthan

हिमालय की गोद में बसा शिव का चमत्कारी धाम, जहां त्रिशूल में होता है कंपन

चमोली, 2 नवंबर (आईएएनएस)। देवभूमि उत्तराखंड को मंदिरों की भूमि कहा जाता है, जहां पर भगवान का वास माना जाता है। ऐसी ही पवित्र भूमि चमोली जिले के गोपेश्वर में स्थित 'श्री गोपीनाथ मंदिर' न सिर्फ अपनी धार्मिक मान्यता के लिए जाना जाता है, बल्कि अपनी प्राचीन वास्तुकला और शांत वातावरण के लिए भी भक्तों को अपनी ओर खींचता है।
 

चमोली, 2 नवंबर (आईएएनएस)। देवभूमि उत्तराखंड को मंदिरों की भूमि कहा जाता है, जहां पर भगवान का वास माना जाता है। ऐसी ही पवित्र भूमि चमोली जिले के गोपेश्वर में स्थित 'श्री गोपीनाथ मंदिर' न सिर्फ अपनी धार्मिक मान्यता के लिए जाना जाता है, बल्कि अपनी प्राचीन वास्तुकला और शांत वातावरण के लिए भी भक्तों को अपनी ओर खींचता है।

उत्तराखंड के चमोली जिले के गोपेश्वर में स्थित श्री गोपीनाथ मंदिर भगवान शिव को समर्पित एक प्राचीन और प्रसिद्ध मंदिर है। नाम 'गोपीनाथ' (श्रीकृष्ण का रूप) होने के बावजूद, यह मंदिर पूरी तरह से भगवान शंकर की आराधना का केंद्र है। हिमालय की गोद में बसे इस मंदिर में आकर भक्तों को आध्यात्मिक शांति और दिव्य अनुभूति का एहसास होता है।

नागर शैली में बने इस ऐतिहासिक मंदिर का निर्माण 9वीं से 11वीं शताब्दी के बीच कत्यूरी राजाओं द्वारा किया गया था। सोमवार को उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने सोशल मीडिया एक्स के माध्यम से सभी से मंदिर की यात्रा करने की अपील की।

उन्होंने लिखा, "चमोली के गोपेश्वर में स्थित श्री गोपीनाथ मंदिर, भगवान शिव की असीम महिमा और आस्था का एक भव्य केंद्र है। हिमालय की मनोरम वादियों और मनमोहक प्राकृतिक वातावरण के बीच स्थित यह प्राचीन मंदिर भक्तों को आध्यात्मिक शांति और दिव्य अनुभव प्रदान करता है। चमोली जिले में आने पर आपको भी इस पवित्र मंदिर के दर्शन अवश्य करने चाहिए।"

मंदिर के प्रांगण में लगभग 5 मीटर (12 फीट) ऊंचा एक विशाल त्रिशूल स्थापित है, जो आठ धातुओं (अष्टधातु) से बना है। इस पर 13वीं सदी के नेपाल के राजा अनेकमल्ल (अशोकचल्ल) का अभिलेख दर्ज है। मान्यता है कि यह त्रिशूल भगवान शिव ने कामदेव पर फेंका था। शारीरिक बल से इसे हिलाया नहीं जा सकता, लेकिन सच्चे भक्त के स्पर्श मात्र से इसमें कंपन महसूस होता है।

यह स्थान शीतकाल (सर्दियों) में भगवान रुद्रनाथ की उत्सव डोली का शीतकालीन गद्दीस्थल (वास) रहता है, जब रुद्रनाथ मंदिर बर्फ से ढक जाता है। लोकमान्यता के अनुसार, भगवान शिव ने कामदेव का वध करने के लिए यहां त्रिशूल फेंका था, जो बाद में वहीं स्थिर हो गया। एक अन्य लोककथा के अनुसार, वृंदावन में श्रीकृष्ण की बांसुरी की धुन सुनकर भगवान शिव गोपियों के वेश (गोपी रूप) में महारास देखने गए थे, तभी से इस क्षेत्र और मंदिर का नाम गोपेश्वर व गोपीनाथ पड़ा। यह मंदिर भगवान रुद्रनाथ (पंच केदारों में से एक) की शीतकालीन गद्दी के रूप में भी प्रसिद्ध है। सर्दियों में भगवान रुद्रनाथ की उत्सव डोली यहीं लाई जाती है और शीतकाल में यहां उनकी पूजा होती है।

--आईएएनएस

एनएस/एएस