गुजरात: खिजाडिया पक्षी अभयारण्य ब्लैक-नेक्ड स्टॉर्क के प्रजनन के लिए बना प्रमुख स्थल, नए शोध में रोचक तथ्य सामने आए
गांधीनगर, 25 अगस्त (आईएएनएस)। गुजरात वन विभाग के अधीनस्थ स्वायत्त संस्था गुजरात इकोलॉजिकल एजुकेशन एंड रिसर्च (जीईईआर यानी गीर) फाउंडेशन के शोधकर्ताओं ने हाल ही में जामनगर जिले में स्थित खिजाडिया पक्षी अभयारण्य में ब्लैक-नेक्ड स्टॉर्क पक्षी के बारे में अध्ययन किया। इस अध्ययन में पता चला कि खिजाडिया पक्षी अभयारण्य ब्लैक-नेक्ड स्टॉर्क (काली गर्दन वाले सारस) के लिए अत्यंत अनुकूल प्रजनन स्थल है। ब्लैक-नेक्ड स्टॉर्क भारत के सबसे बड़े तथा विशिष्ट जलपक्षियों में से एक है।
इस अध्ययन में ब्लैक-नेक्ड स्टॉर्क पक्षी की प्रजनन की उल्लेखनीय सफलता देखने को मिली। निरीक्षण अंतर्गत लाए गए चारों घोंसलों से बच्चे सफलतापूर्वक बाहर आए। अध्ययन के निष्कर्ष बताते हैं कि रामसर साइट के रूप में घोषित खिजाडिया पक्षी अभयारण्य ब्लैक-नेक्ड स्टॉर्क पक्षी के लिए महत्वपूर्ण स्थान है।
पीयर-रिव्यूड अंतरराष्ट्रीय जर्नल ऑफ थ्रेटेंड टैक्सा में प्रकाशित इस अध्ययन में जुलाई 2024 से मार्च 2025 के दौरान खिजाडिया पक्षी अभयारण्य में ब्लैक-नेक्ड स्टॉर्क की आबादी की स्थिति, प्रजनन पारिस्थितिकी (ब्रीडिंग इकोलॉजी), घोंसले के स्थानों की विशेषताओं और प्रजनन क्षमता का मूल्यांकन किया गया। यह शोध गीर फाउंडेशन के वैज्ञानिकों संदीप मुंजपरा, दिव्यराजसिंह जाडेजा, नीता सोलंकी, अमित कुमार नायक और बीपी पति द्वारा किया गया।
वन एवं पर्यावरण मंत्री अर्जुन मोढवाडिया ने कहा, ''गीर फाउंडेशन की पूरी शोध टीम को मैं बधाई देता हूँ। इस अध्ययन ने ब्लैक-नेक्ड सारस पक्षी के अद्भुत व्यवहार एवं प्रजनन पारिस्थितिकी पर नया प्रकाश डाला है। इन निष्कर्षों के आधार पर हम इस पक्षी के संरक्षण के बारे में प्रभावी कदम उठा सकेंगे।''
वन एवं पर्यावरण राज्य मंत्री प्रवीण माली ने कहा, “मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल के नेतृत्व में राज्य सरकार ने खिजडिया पक्षी अभयारण्य सहित राज्य की अमूल्य प्राकृतिक विरासत के संरक्षण के लिए अनेक कदम उठाए हैं।”
ब्लैक-नेक्ड स्टॉर्क अपनी कम संख्या में पाई जाने वाली प्रजनन आबादी के लिए जाना जाता है। गुजरात में खिजाडिया पक्षी अभयारण्य और इसके आसपास का क्षेत्र लंबे समय से इस पक्षी के लिए महत्वपूर्ण आवास के रूप में पहचाना जाता है। हालांकि, इसके प्रजनन के बारे में हमारे पास बहुत कम जानकारी उपलब्ध है।
गीर फाउंडेशन के निदेशक बीपी पति (आईएफएस) ने कहा, ''शोधकर्ताओं ने अभयारण्य के आठ मैनेजमेंट जोन में फैले 48 जियोरेफरेंस्ड सैंपलिंग प्वाइंट का उपयोग करके व्यापक क्षेत्र सर्वेक्षण किया। अध्ययन में घोंसले का निरीक्षण, व्यवहार का अवलोकन और इसके आवास का मूल्यांकन किया गया। इस दौरान 320 घंटे से अधिक के अवलोकन के आंकड़े एकत्र किए गए।''
बीपी पति ने आगे कहा, ''अध्ययन में सबसे उल्लेखनीय बात यह सामने आई कि अध्ययन अंतर्गत ब्लैक-नेक्ड स्टॉर्क के चार सक्रिय घोंसलों में प्रत्येक घोंसले में एक प्रजनन जोड़ी थी और प्रत्येक जोड़ी ने सफलतापूर्वक दो बच्चों का पालन-पोषण किया था। इस प्रकार, चार घोंसलों में कुल आठ बच्चे दर्ज हुए। इसके अलावा, नियमित रूप से दिखाई देने वाले पांच गैर-प्रजनन वयस्क पक्षियों सहित अध्ययन अवधि के दौरान अभयारण्य में इस पक्षी की संख्या 21 से अधिक दर्ज की गई थी।''
शोध में पता चला कि ब्लैक-नेक्ड स्टॉर्क के चारों घोंसले बबूल के पेड़ पर बनाए गए थे। ये घोंसले जमीन से तीन से 4.5 मीटर की ऊंचाई पर थे। सामान्यतः ब्लैक-नेक्ड स्टॉर्क बबूल तथा बरगद-पीपल जैसे बड़े आकार की स्थानीय वृक्ष प्रजातियों पर घोंसले बनाते हैं। हालांकि, इस अध्ययन में पता चला कि जहां स्थानीय स्तर पर घोंसला बनाने के लिए उपयुक्त वृक्षों की उपलब्धता कम होती है, वहां यह पक्षी बबूल जैसे पेड़ों पर भी घोंसले बनाता है।
प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यजीव) डॉ. जयपाल सिंह ने कहा, ''यह शोध ब्लैक-नेक्ड स्टॉर्क के आवास के पारिस्थितिक महत्व को भी और मजबूत बनाता है। ब्लैक-नेक्ड स्टॉर्क को जीवित रहने और प्रजनन करने के लिए केवल पानी पर्याप्त नहीं है। इसके सफल प्रजनन के लिए उपयुक्त भोजन प्राप्त करने वाले क्षेत्र, जलीय शिकार, घोंसला बनाने योग्य पेड़, उथला पानी, वनस्पति और अपेक्षाकृत कम मानवीय हस्तक्षेप वाले क्षेत्र आवश्यक हैं।''
डॉ. जयपाल सिंह ने जोड़ा, ''चारों घोंसलों के स्थानों की विशेषताएं-विशेष रूप से उथला पानी, जल सतह के ऊपर की वनस्पति, ऊंचे स्थान और कम व्यवधान-आवास प्रबंधन के लिए महत्वपूर्ण संकेत देती हैं। इन परिस्थितियों को बनाए रखना खिजडिया में इस प्रजाति की प्रजनन आबादी को बनाए रखने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हो सकता है।''
गीर फाउंडेशन के उप निदेशक अमितकुमार नायक ने कहा, ''घोंसलों के सभी स्थानों में कुछ सामान्य पारिस्थितिक विशेषताएं देखने को मिलीं। सभी घोंसले 0.3 से 0.7 मीटर की गहराई वाले उथले पानी वाले क्षेत्रों के पास थे और उनके आसपास खुला पानी, जल सतह के ऊपर की वनस्पति तथा ऊंचा क्षेत्र था। ये परिस्थितियां मछली, उभयचर, क्रस्टेशियन और जलीय अकशेरुकी जीवों सहित पर्याप्त भोजन स्रोत उपलब्ध कराती हैं, जो प्रजनन करने वाले पक्षियों और बढ़ते बच्चों के लिए आवश्यक हैं।''
शोधकर्ताओं ने नोट किया कि अगस्त और सितंबर में इस पक्षी के व्यवहार में बदलाव के साथ प्रजनन गतिविधि शुरू हुई और इसके बाद अक्टूबर की शुरुआत में घोंसला बनाने की प्रक्रिया शुरू हुई थी। अक्टूबर के अंत से नवंबर की शुरुआत के दौरान अंडों से बच्चे बाहर आए थे, जबकि दिसंबर तक बच्चों के पालन-पोषण की गहन प्रक्रिया जारी रही थी। वर्ष के अंत तक बच्चे घोंसले से बाहर निकल गए और प्रजनन चक्र पूरा हो गया।
गीर फाउंडेशन के वैज्ञानिक तथा अध्ययन के एक लेखक डॉ. संदीप मुंजपरा ने कहा, ''अध्ययन में इस प्रजाति द्वारा दरशाई जाने वाली मजबूत पितृत्व की जिम्मेदारी देखने को मिली। इस पक्षी के 89 निरीक्षण और दौरों के दौरान हमने दर्ज किया कि वयस्क स्टॉर्क औसतन 62 मिनट तक घोंसले में मौजूद रहे। भोजन प्राप्त करने के लिए दर्ज की गई 94 प्रतिशत उड़ानों में एक माता-पिता पक्षी ने घोंसले पर दूसरे पक्षी का स्थान लिया। यह बात माता-पिता द्वारा बेहद समन्वित ढंग से बच्चों की देखभाल किए जाने को दर्शाती है। ऐसे व्यवहार से अंडों और बच्चों की लगातार सुरक्षा और देखभाल सुनिश्चित होती है।''
महत्वपूर्ण बात यह है कि घोंसलों के निरीक्षण की अवधि के दौरान शोधकर्ताओं ने घोंसला छोड़ने, शिकारी जानवरों द्वारा हमला किए जाने या बच्चों की मृत्यु की एक भी घटना दर्ज नहीं की। चारों घोंसलों से बच्चे सफलतापूर्वक बाहर निकले, जिसके परिणामस्वरूप 100 प्रतिशत फ्लेजिंग सफलता दर दर्ज की गई। अध्ययन के अनुसार, इतनी अधिक प्रजनन सफलता भारत के अन्य क्षेत्रों में किए गए अवलोकनों की तुलना में उल्लेखनीय है। यहां घोंसले से बच्चों के सफलतापूर्वक बाहर निकलने का अनुपात अधिक देखा गया है।
घोंसले से बाहर आने के बाद के अवलोकनों में पता चला कि स्टॉर्क के बच्चे घोंसला छोड़ने के बाद अपने माता-पिता पर निर्भर रहते थे। भोजन के लिए कई बार अनुरोध और माता-पिता द्वारा बच्चों के साथ भोजन साझा करने की घटनाएं शोधकर्ताओं ने दर्ज कीं। यह लंबे समय तक माता-पिता की देखभाल और स्वतंत्र रूप से भोजन प्राप्त करने की क्षमता के क्रमशः विकास की ओर संकेत करता है।
अभयारण्य में अपेक्षाकृत स्थिर जल परिस्थितियां, प्रचुर मात्रा में शिकार/भोजन की उपलब्धता और मानवीय हस्तक्षेप का कम स्तर इस प्रजनन सफलता में महत्वपूर्ण कारक माने जाते हैं। घोंसले प्रतिबंधित क्षेत्रों में थे, जहां पानी वाले क्षेत्रों तथा पेड़ों से आच्छादित क्षेत्रों के बीच की सीमा तथा ऊंचे टीले जैसे भू-भाग थे। इन क्षेत्रों में बाढ़ का जोखिम कम रहता है और निकट के भोजन प्राप्त करने वाले क्षेत्रों तक आसानी से पहुँचा जा सकता है।
--आईएएनएस
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