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ग्लोबल वार्मिंग: भविष्य में बढ़ेगी बारिश, अगस्त होगा सबसे अधिक वर्षा वाला महीना

नई दिल्ली, 17 मार्च (आईएएनएस)। एक अध्ययन से पता चला है कि लगभग 30 लाख वर्ष पहले भारत में मानसूनी वर्षा मौजूदा समय के मुकाबले कहीं अधिक थी। भारतीय उच्च शिक्षा संस्थान, एनआईटी राउरकेला ने यह अध्ययन किया है। यह अध्ययन बताता है कि भविष्य की ग्लोबल वार्मिंग का भारतीय ग्रीष्मकालीन मानसून पर प्रभाव पड़ेगा। गर्म जलवायु के कारण वर्षा में वृद्धि होने की संभावना है। भविष्य में ज्यादा बारिश के साथ-साथ सबसे अधिक मानसूनी वर्षा वाला महीना भी जुलाई से बदलकर अगस्त हो सकता है।
 
ग्लोबल वार्मिंग: भविष्य में बढ़ेगी बारिश, अगस्त होगा सबसे अधिक वर्षा वाला महीना

नई दिल्ली, 17 मार्च (आईएएनएस)। एक अध्ययन से पता चला है कि लगभग 30 लाख वर्ष पहले भारत में मानसूनी वर्षा मौजूदा समय के मुकाबले कहीं अधिक थी। भारतीय उच्च शिक्षा संस्थान, एनआईटी राउरकेला ने यह अध्ययन किया है। यह अध्ययन बताता है कि भविष्य की ग्लोबल वार्मिंग का भारतीय ग्रीष्मकालीन मानसून पर प्रभाव पड़ेगा। गर्म जलवायु के कारण वर्षा में वृद्धि होने की संभावना है। भविष्य में ज्यादा बारिश के साथ-साथ सबसे अधिक मानसूनी वर्षा वाला महीना भी जुलाई से बदलकर अगस्त हो सकता है।

इस अध्ययन के निष्कर्ष प्रतिष्ठित इंटरनेशनल जर्नल ऑफ क्लाइमेटोलोजी में प्रकाशित हुए हैं। दरअसल, भारतीय ग्रीष्मकालीन मानसून भारत की लगभग 80 प्रतिशत वार्षिक वर्षा लाता है और यह करोड़ों लोगों की आजीविका का आधार है। विशेष रूप से उन लोगों के लिए जो कि कृषि पर निर्भर हैं। नियमित मानसूनी वर्षा न केवल भारत में बल्कि पूरे दक्षिण एशिया में खाद्य उत्पादन, जल संसाधनों और आर्थिक स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण है। जलवायु परिवर्तन के कारण जब वैश्विक तापमान बढ़ रहा है, तब विभिन्न वैश्विक अध्ययनों के परिणामों में कुछ विरोधाभास देखने को मिलता है।

कुछ अध्ययनों के अनुसार बढ़ता तापमान वर्षा को कम कर सकता है, जबकि अन्य अध्ययनों का निष्कर्ष है कि मानसूनी वर्षा और अधिक मजबूत हो सकती है। चूंकि मानसून का मानव जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ता है, इसलिए यह समझना अत्यंत आवश्यक है कि भारतीय मानसून भविष्य में कैसे प्रतिक्रिया देगा। इस अंतर को समझने के लिए एनआईटी राउरकेला ने एक विशेष अध्ययन किया।

एनआईटी के असिस्टेंट प्रोफेसर, प्रो. नागराजु चिलुकोटी और शोध स्नातक डॉ. करिश्मा दहिया ने आईआईएसईआर मोहाली के एसोसिएट प्रोफेसर, प्रो. राजू अटाडा के साथ मिलकर यह अध्ययन किया। उन्होंने यह विश्लेषण किया कि पृथ्वी के अतीत के गर्म कालखंडों में मानसून का व्यवहार कैसा था, ताकि भविष्य के बारे में बेहतर समझ मिल सके। इसके लिए शोध दल ने जलवायु मॉडलों का उपयोग करते हुए दो गर्म कालखंडों की तुलना की। एक कालखंड मध्य-प्लायोसीन काल था। मध्य-प्लायोसीन काल भूवैज्ञानिक समय का एक उपविभाग है, जो लगभग 3.3 से 3.0 मिलियन वर्ष पहले तक फैला हुआ था।

वैज्ञानिक इस काल का अध्ययन अक्सर भविष्य के जलवायु परिवर्तन को समझने के लिए करते हैं, क्योंकि उस समय पृथ्वी की जलवायु प्रणाली के कई पहलू वर्तमान ग्लोबल वॉर्मिंग के अनुमानित भविष्य से मिलते-जुलते हैं। मध्य-प्लायोसीन काल के दौरान ग्लोबल वॉर्मिंग औद्योगिक-पूर्व स्तरों से लगभग 4 डिग्री अधिक थी। आज के जलवायु अनुमानों के अनुसार, इस सदी के अंत तक तापमान इसी स्तर तक पहुंच सकता है।

इसी आधार पर शोधकर्ताओं ने अध्ययन किया कि जब पृथ्वी अधिक गर्म होती है, तब भारतीय ग्रीष्मकालीन मानसून कैसे प्रतिक्रिया देता है। अध्ययन से पता चलता है कि मध्य-प्लायोसीन काल में भारत में मानसूनी वर्षा अधिक थी, और भविष्य में गर्म जलवायु के कारण इसी प्रकार की वृद्धि होने की संभावना है। हालांकि, दोनों परिस्थितियों में वर्षा बढ़ने के कारण अलग-अलग हैं। मध्य-प्लायोसीन काल में तेज हवाओं और अधिक सक्रिय वायुमंडलीय परिसंचरण के कारण मानसूनी वर्षा अधिक मजबूत थी। जबकि भविष्य के परिदृश्य में वर्षा में वृद्धि का मुख्य कारण यह होगा कि गर्म वायुमंडल अधिक नमी धारण कर सकता है।

प्रो. नागराजु चिलुकोटी ने बताया, “अतीत भविष्य को समझने की कुंजी है। मध्य-प्लायोसीन की गर्म जलवायु का अध्ययन करके हमें यह महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है कि ग्लोबल वॉर्मिंग के चलते भारतीय ग्रीष्मकालीन मानसून किस प्रकार प्रतिक्रिया दे सकता है। हमारी टीम ने पाया कि गर्म जलवायु के कारण भारतीय महासागर और भारतीय भूभाग के ऊपर वायुमंडल में नमी बढ़ने की संभावना है, जिससे भारत की ओर नमी का प्रवाह मजबूत हो सकता है। टीम ने यह भी पाया कि मानसून का सबसे अधिक वर्षा वाला महीना जुलाई से बदलकर अगस्त हो सकता है। ये निष्कर्ष भारत और आसपास के क्षेत्रों में जलवायु तैयारी, कृषि और जल प्रबंधन के लिए महत्वपूर्ण हैं।”

शोधकर्ताओं के मुताबिक, वर्षा पैटर्न की बेहतर समझ सरकारी अधिकारियों और पूर्वानुमान एजेंसियों को बाढ़ और सूखे के लिए प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली में सुधार करने में मदद कर सकती है। यदि वर्षा का समय और तीव्रता बदलती है तो इससे किसानों को फसल चक्र और सिंचाई की प्रभावी ढंग से योजना बनाने में भी मदद मिल सकती है। इसके अतिरिक्त, यह अध्ययन नीति-निर्माताओं को गंगा और ब्रह्मपुत्र जैसी प्रमुख नदी प्रणालियों में जल संसाधनों के बेहतर प्रबंधन में सहायता कर सकता है और बाढ़-प्रवण क्षेत्रों में आपदा तैयारी तथा शहरी योजना को मजबूत बनाने में भी मदद कर सकता है।

--आईएएनएस

जीसीबी/डीकेपी