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गेरुआ वस्त्र संन्यास की पहचान, कसौटी नहीं: स्वामी निरंजनानंद

मुंगेर, 12 सितंबर (आईएएनएस)। परमहंस स्वामी निरंजनानंद सरस्वती ने कहा कि गेरुआ वस्त्र संन्यास की पहचान हो सकता है, लेकिन यह संन्यास की कसौटी नहीं है। सच्चा संन्यास अपने छोटे ‘मैं’ से ऊपर उठकर गुरु के संकल्प, सेवा और मानवता के कल्याण के लिए जीवन समर्पित करने का नाम है।
 

मुंगेर, 12 सितंबर (आईएएनएस)। परमहंस स्वामी निरंजनानंद सरस्वती ने कहा कि गेरुआ वस्त्र संन्यास की पहचान हो सकता है, लेकिन यह संन्यास की कसौटी नहीं है। सच्चा संन्यास अपने छोटे ‘मैं’ से ऊपर उठकर गुरु के संकल्प, सेवा और मानवता के कल्याण के लिए जीवन समर्पित करने का नाम है।

उन्होंने कहा कि परमगुरु परमहंस स्वामी सत्यानंद सरस्वती ने इसी अर्थ में संन्यास को जिया और अपना पूरा जीवन योग, साधना, सेवा तथा मानव-कल्याण के लिए समर्पित किया। बिहार के मुंगेर स्थित पादुका दर्शन संन्यास पीठ में शनिवार को लक्ष्मीनारायण महायज्ञ की पूर्णाहुति के साथ आयोजित संन्यास दिवस समारोह में स्वामी निरंजनानंद ने स्वामी सत्यानंद के जीवन और संन्यास के मर्म पर प्रकाश डाला।

उन्होंने कहा कि 12 सितंबर स्वामी सत्यानंद के जीवन का महत्वपूर्ण दिन है। इसी दिन ऋषिकेश में उन्होंने अपने गुरु स्वामी शिवानंद सरस्वती से संन्यास की दीक्षा ली थी। यह उनके लिए एक अर्थ में पुनर्जन्म था, जो शरीर का नहीं, बल्कि चेतना, उद्देश्य और जीवन-दृष्टि का पुनर्जन्म था। उन्होंने कहा कि सिर मुंडा लेने और गेरुआ वस्त्र धारण कर लेने भर से कोई संन्यासी नहीं बन जाता। सच्चे संन्यास की पहचान व्यक्ति के आचरण, समर्पण और सेवा से होती है।

स्वामी सत्यानंद ने जन्म से मिले नाम, परिचय और पारिवारिक पहचान से आगे बढ़कर गुरु की आज्ञा को जीवन का आधार बनाया और उनके मिशन को आगे बढ़ाया। स्वामी निरंजनानंद ने कहा कि कुछ लोग अपने लिए नहीं, बल्कि दूसरों के लिए जीते हैं और ऐसे लोग ईश्वर के दूत होते हैं।

उन्होंने परमहंस रामकृष्ण और स्वामी विवेकानंद का उदाहरण देते हुए कहा कि गुरु अपने उत्तराधिकारी का चयन उसकी पात्रता देखकर करते हैं। गुरु केवल प्रशंसा करने वाला नहीं होता, बल्कि शिष्य के भीतर मौजूद अहंकार और नकारात्मकता को दूर करने का कार्य भी करता है। गुरु की डांट भी शिष्य को बेहतर बनाने का माध्यम होती है। उन्होंने कहा कि गुरु के प्रति श्रद्धा, प्रेम और समर्पण साधना की अनिवार्य शर्तें हैं।

स्वामी सत्यानंद ने स्वामी शिवानंद के सान्निध्य में इन्हीं गुणों को अपने जीवन में विकसित किया। योग के महत्व पर उन्होंने कहा कि योग केवल शारीरिक स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जीवन में संतुलन, शांति और सुख स्थापित करने का माध्यम है। अच्छा व्यवहार, दूसरों की सहायता, जरूरतमंद को सहारा देना, प्रकृति और जीवों के प्रति संवेदनशीलता भी योग का हिस्सा है। महायज्ञ के पांचवें दिन पादुका दर्शन परिसर में साधना और भक्ति का वातावरण रहा।

श्रद्धालुओं ने ‘ॐ नमो नारायणाय’ का 108 बार सामूहिक पाठ किया। महालक्ष्मी अष्टकम, सद्गुरु गायत्री और गुरु-वंदना का भी सामूहिक पाठ हुआ। कार्यक्रम के अंत में ‘बोलो जय सत्यानंद’ और ‘गुरुवर सत्यानंद, जीवन बने योग गीत’ की प्रस्तुति से परिसर भक्तिमय हो उठा। समारोह में संन्यास का संदेश यही रहा कि यह केवल गेरुआ वस्त्र धारण करने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि अहं से ऊपर उठकर गुरु के आदर्शों को जीवन में उतारने और समाज तथा मानवता के लिए स्वयं को समर्पित करने की साधना है।

--आईएएनएस

एमएनपी/डीकेपी