एक न्योता, कई शर्तें और फिर सैनिक का वेश, जब चीनी फौज से छुपते छुपाते तिब्बत छोड़कर भारत पहुंचे दलाई लामा
नई दिल्ली, 5 जुलाई (आईएएनएस)। मार्च 1959 में चीन की फौज दलाई लामा तेनजिन ग्यात्सो का पीछा कर रही थी और वे किसी भी वक्त उन्हें अपने कब्जे में कर सकती थी। दलाई लामा अपने कुछ साथियों के साथ भारत-चीन की सीमा से लगे अरुणाचल प्रदेश के तवांग पहुंचे। सीमा पर मौजूद भारतीय फौज और स्थानीय प्रशासन ने उन्हें तुरंत सुरक्षा दी। इसके बाद उन्हें अरुणाचल प्रदेश से असम लेकर आ गए। भारत में पहुंचने के कुछ हफ्ते बाद दलाई लामा की मुलाकात तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से हुई। तब आधिकारिक तौर पर इस बात का ऐलान किया गया कि भारत ने दलाई लामा को शरण दी है।
6 जुलाई 1935 को तिब्बत के छोटे से गांव तक्तसेर में जन्मे दलाई लामा तेनजिन ग्यात्सो तिब्बती जनता के आध्यात्मिक और लौकिक नेता हैं। तिब्बती परंपरा के अनुसार, उन्हें दो साल की उम्र में ही उनके पूर्ववर्ती 13वें दलाई लामा के पुनर्जन्म के रूप में मान्यता दी गई थी। दलाई लामा करुणा के बोधिसत्व के अवतार हैं, जिन्होंने जनता की सेवा करने के लिए पुनर्जन्म लिया। 'दलाई लामा' का अर्थ है 'ज्ञान का सागर'। तिब्बती लोग आमतौर पर उन्हें येशिन नोरबू, यानी 'इच्छा पूरी करने वाला रत्न' कहकर संबोधित करते हैं।
1950 में, जब तिब्बत चीन की शक्ति से खतरे में था, तब दलाई लामा को राष्ट्राध्यक्ष और सरकार प्रमुख के रूप में पूर्ण राजनीतिक सत्ता संभालने का आह्वान किया गया। 1954 में, वे माओ त्से-तुंग, चाउ एन-लाई और डेंग शियाओपिंग सहित अन्य चीनी नेताओं से बातचीत करने के लिए बीजिंग गए। 1956 में, 2500वीं बुद्ध जयंती में भाग लेने के लिए भारत यात्रा के दौरान उन्होंने तिब्बत की बिगड़ती स्थिति के बारे में तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू और प्रधानमंत्री चाउ के साथ कई बैठकें कीं। 1959 में तिब्बत पर चीनी सैन्य कब्जे के बाद उन्हें भारत में निर्वासन में जाने के लिए मजबूर होना पड़ा।
दलाई लामा के जीवन पर आधारित एक वेबसाइट के लेख में जिक्र मिलता है कि 10 मार्च 1959 को चीनी जनरल झांग चेनवू ने दलाई लामा को एक कार्यक्रम में आने का निमंत्रण दिया। बाद में शर्त रखी गई कि उनके साथ कोई तिब्बती सैनिक या सशस्त्र अंगरक्षक नहीं होगा। जब निमंत्रण को कुछ नई शर्तों के साथ दोहराया गया कि दलाई लामा के साथ कोई तिब्बती सैनिक नहीं होना चाहिए और उनके अंगरक्षक निहत्थे होने चाहिए, तो इससे ल्हासा के लोगों में भारी चिंता फैल गई। हजारों लोग नोरबुलिंगका महल के बाहर जुट गए और उन्होंने दलाई लामा को कार्यक्रम में जाने से रोक दिया।
इसके एक हफ्ते बाद, 17 मार्च 1959 को नेचुंग ओरेकल से परामर्श के दौरान स्पष्ट निर्देश मिला कि दलाई लामा को तुरंत तिब्बत छोड़ देना चाहिए। उसी दिन रात के 10 बजे से कुछ मिनट पहले दलाई लामा एक आम सैनिक के वेश में लोगों की विशाल भीड़ से चुपके से निकल गए। बाद में उनके परिवार और अन्य सहयोगी भी उनके साथ जुड़ गए। ल्हासा से भागने के तीन सप्ताह बाद 31 मार्च 1959 को दलाई लामा और उनके दल भारतीय सीमा पर पहुंचे, जहां से भारतीय फौज उन्हें अपनी सुरक्षा में देश के भीतर लेकर आ गई।
उस समय अरुणाचल प्रदेश की पहचान 'नेफा' नाम से होती थी। दलाई लामा के आने से पहले ही कई लोगों ने तिब्बत से भागकर भारत में शरण ले ली थी। हालांकि बौद्ध धर्म के धर्मगुरु दलाई लामा के भारत में शरण लेने के बाद बड़े पैमाने पर तिब्बती लोग भारत के उत्तर पूर्व राज्यों के अलावा देश के दूसरे कोनों में भी फैल गए।
1960 से दलाई लामा धर्मशाला में रह रहे हैं, जिसे 'छोटा ल्हासा' के नाम से जाना जाता है, जो निर्वासित तिब्बती सरकार का मुख्यालय है।
निर्वासन के शुरुआती वर्षों में दलाई लामा ने तिब्बत के मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र से अपील की, जिसके परिणामस्वरूप महासभा की ओर से 1959, 1961 और 1965 में तीन प्रस्ताव पारित किए गए। 1963 में दलाई लामा ने तिब्बत के लिए एक मसौदा संविधान जारी किया, जो लोकतांत्रिक शासन प्रणाली का आश्वासन देता है। पिछले दो दशकों में, उन्होंने कई शैक्षणिक, सांस्कृतिक और धार्मिक संस्थानों की स्थापना की है, जिन्होंने तिब्बती पहचान और उसकी समृद्ध विरासत के संरक्षण में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उन्होंने कई उपदेश और दीक्षाएं दीं, जिनमें दुर्लभ कालचक्र दीक्षा भी शामिल है, जिसे उन्होंने अपने पूर्ववर्तियों की तुलना में अधिक बार संपन्न किया है।
--आईएएनएस
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