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दीना पाठक ने 60 साल तक अपने अभिनय से जीता दिल, थिएटर से लेकर फिल्मों तक छोड़ी अमिट छाप

नई दिल्ली, 10 अक्टूबर (आईएएनएस)। हिंदी सिनेमा में जब भी यादगार मां और दादी के किरदारों की बात होती है, तो अभिनेत्री दीना पाठक का चेहरा आंखों के सामने आ जाता है। सफेद बाल, सहज अंदाज और संवाद बोलने का अनोखा तरीका उनकी पहचान बन गया था। दीना पाठक की पहचान सिर्फ फिल्मों तक सीमित नहीं थी। 11 अक्टूबर को उनकी पुण्यतिथि पर आइए, उनके जीवन और शानदार अभिनय सफर से जुड़ी कुछ खास बातें जानते हैं।
 

नई दिल्ली, 10 अक्टूबर (आईएएनएस)। हिंदी सिनेमा में जब भी यादगार मां और दादी के किरदारों की बात होती है, तो अभिनेत्री दीना पाठक का चेहरा आंखों के सामने आ जाता है। सफेद बाल, सहज अंदाज और संवाद बोलने का अनोखा तरीका उनकी पहचान बन गया था। दीना पाठक की पहचान सिर्फ फिल्मों तक सीमित नहीं थी। 11 अक्टूबर को उनकी पुण्यतिथि पर आइए, उनके जीवन और शानदार अभिनय सफर से जुड़ी कुछ खास बातें जानते हैं।

दीना पाठक की बचपन से ही अभिनय और कला में रुचि थी। उन्होंने मुंबई विश्वविद्यालय से स्नातक की पढ़ाई की और अभिनय का प्रशिक्षण राशीकला पारेख से लिया। इसके अलावा, उन्होंने शांति वर्धन से नृत्य की शिक्षा भी प्राप्त की।

दीना बेहद कम उम्र में इंडियन नेशनल थिएटर से जुड़ गई थीं। गुजराती थिएटर में उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई। वह भवई थिएटर से भी जुड़ी रहीं, जो गुजरात की पारंपरिक लोकनाट्य शैली है। अपने अभिनय के माध्यम से उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ लोगों को जागरूक करने में भी भूमिका निभाई।

दीना पाठक का जीवन केवल कला तक सीमित नहीं था। जब वह कॉलेज में पढ़ रही थीं, तब उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सा लिया। इसके कारण उन्हें कॉलेज से निकाल दिया गया। हालांकि, उन्होंने हार नहीं मानी और दूसरे कॉलेज में दाखिला लेकर अपनी पढ़ाई पूरी की। उनकी जिंदगी संघर्ष, आत्मविश्वास और अपने सिद्धांतों पर कायम रहने की मिसाल रही।

दीना पाठक महिला सशक्तीकरण के लिए भी सक्रिय थीं। वह नेशनल फेडरेशन ऑफ इंडियन वूमेन की अध्यक्ष रहीं और सामाजिक मुद्दों पर अपनी आवाज बुलंद करती रहीं।

दीना पाठक की लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 1940 के दशक में उनके नाटकों को देखने के लिए दर्शक बड़ी संख्या में थिएटर पहुंचते थे। साल 1957 में उन्होंने राष्ट्रपति भवन में तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद के सामने प्रस्तुति दी। इस उपलब्धि ने उन्हें विशेष पहचान दिलाई और गुजराती रंगमंच के लिए भी यह एक उल्लेखनीय क्षण था।

दीना पाठक ने 1948 में गुजराती फिल्म 'करियावर' से अपने फिल्मी करियर की शुरुआत की। इसके बावजूद उन्होंने थिएटर से अपना रिश्ता कभी नहीं तोड़ा। 1960 के दशक में उन्होंने 'सत्यकाम', 'सात हिंदुस्तानी' और 'द गुरु' जैसी फिल्मों में काम किया।

इसके बाद वह 'मौसम', 'किनारा', 'किताब', 'चितचोर', 'घरौंदा' और 'भूमिका' जैसी फिल्मों में नजर आईं। अपनी सहज अदाकारी के कारण वह हर किरदार में जान डाल देती थीं। आगे चलकर उन्होंने मां और दादी की भूमिकाओं में भी खूब लोकप्रियता हासिल की। उनके अभिनय में बनावटीपन नहीं बल्कि जिंदगी की सच्चाई झलकती थी।

दीना पाठक ने अपने लगभग छह दशक लंबे करियर में 120 से अधिक फिल्मों में काम किया। उन्होंने तीन अंतर्राष्ट्रीय परियोजनाओं में भी अपनी प्रतिभा दिखाई। लोकप्रिय टेलीविजन शो 'मालगुडी डेज' में भी वह नजर आईं। उनकी अंतिम फिल्मों में 'पिंजर' का नाम शामिल है।

दीना पाठक की दो बेटियां रत्ना पाठक शाह और सुप्रिया पाठक हैं। दोनों ने अपनी मां की तरह अभिनय की दुनिया में कदम रखा और अपनी प्रतिभा के दम पर अलग पहचान बनाई। इस तरह दीना की कला और अभिनय की विरासत अगली पीढ़ी तक पहुंची।

फिल्मों में दशकों तक काम करने और लोकप्रियता हासिल करने के बावजूद दीना पाठक सादा जीवन जीना पसंद करती थीं। उन्होंने अपनी निजी जिंदगी में दिखावे से दूरी बनाए रखी। उनका जीवन इस बात का उदाहरण था कि असली पहचान धन-दौलत से नहीं बल्कि प्रतिभा, विचारों और कर्मों से बनती है।

दीना पाठक ने गुजराती रंगमंच से लेकर हिंदी सिनेमा तक अपनी प्रतिभा की अमिट छाप छोड़ी। उनके किरदार आज भी दर्शकों को याद आते हैं। उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें याद करना भारतीय सिनेमा, रंगमंच और महिला सशक्तीकरण में उनके योगदान को सम्मान देने जैसा है।

--आईएएनएस

एसएके/पीएम