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दीपावली स्पेशल : सपने में दिखीं समुद्र के नीचे छिपी देवियों की मूर्तियां, ऐसे बना मुंबई का प्रसिद्ध महालक्ष्मी मंदिर

मुंबई, 1 नवंबर (आईएएनएस)। देशभर में मां लक्ष्मी के कई प्रसिद्ध मंदिर हैं, जहां सालभर भक्तों की भीड़ लगी रहती है। इन्हीं में से एक है मुंबई का प्रसिद्ध श्री महालक्ष्मी मंदिर। इस मंदिर की खासियत सिर्फ इसकी धार्मिक मान्यता नहीं बल्कि इससे जुड़ी एक बेहद दिलचस्प कहानी भी है। कहा जाता है कि यहां विराजमान तीन देवियों की मूर्तियां कभी समुद्र की गहराइयों में छिपी हुई थीं। एक पुजारी को सपने में इनके बारे में पता चला और फिर इन मूर्तियों को मंदिर में स्थापित किया गया।
 

मुंबई, 1 नवंबर (आईएएनएस)। देशभर में मां लक्ष्मी के कई प्रसिद्ध मंदिर हैं, जहां सालभर भक्तों की भीड़ लगी रहती है। इन्हीं में से एक है मुंबई का प्रसिद्ध श्री महालक्ष्मी मंदिर। इस मंदिर की खासियत सिर्फ इसकी धार्मिक मान्यता नहीं बल्कि इससे जुड़ी एक बेहद दिलचस्प कहानी भी है। कहा जाता है कि यहां विराजमान तीन देवियों की मूर्तियां कभी समुद्र की गहराइयों में छिपी हुई थीं। एक पुजारी को सपने में इनके बारे में पता चला और फिर इन मूर्तियों को मंदिर में स्थापित किया गया।

मुंबई के महालक्ष्मी मंदिर की स्थापना से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध कथा 18वीं शताब्दी की है। उस समय मुंबई को बॉम्बे कहा जाता था। ब्रिटिश शासन के दौरान गवर्नर विलियम होर्नबी के नेतृत्व में होर्नबी वेलार्ड नाम की एक बड़ी समुद्री परियोजना शुरू की गई थी। इसका उद्देश्य बॉम्बे के सात द्वीपों को जोड़ना था।

हालांकि, इस परियोजना को पूरा करना आसान नहीं था। समुद्र की तेज लहरें बार-बार निर्माण कार्य को नुकसान पहुंचा रही थीं। इंजीनियर और कर्मचारी काफी परेशान थे। इसी बीच एक स्थानीय हिंदू पुजारी को सपने में देवी महालक्ष्मी की मूर्ति समुद्र के नीचे दिखाई दी। इसके बाद जब समुद्र में खोज की गई तो वहां से तीन देवियों की मूर्तियां मिलीं। ये मूर्तियां मां महालक्ष्मी, मां महाकाली और मां महासरस्वती की थीं।

कहा जाता है कि इन मूर्तियों को विधि-विधान से स्थापित करने के लिए मंदिर बनवाया गया। इसके बाद समुद्री परियोजना का काम भी सफलतापूर्वक पूरा हो गया। यही वजह है कि इस मंदिर को लेकर भक्तों के मन में गहरी आस्था है।

मंदिर के इतिहास के अनुसार, यहां मूल मंदिर का निर्माण लगभग 1761 में रामजी शिवजी प्रभु नाम के एक हिंदू व्यापारी ने करवाया था। बाद में 1831 में धाकजी दादाजी नाम के एक धनी व्यापारी ने मंदिर का पुनर्निर्माण और विस्तार करवाया। इसके बाद मंदिर ने भव्य रूप लिया और मुंबई के प्रमुख धार्मिक स्थलों में अपनी जगह बना ली।

श्री महालक्ष्मी मंदिर की सबसे बड़ी खासियत यहां विराजमान तीन देवियां हैं। गर्भगृह में मां महालक्ष्मी, मां महाकाली और मां महासरस्वती एक साथ विराजती हैं। मां महालक्ष्मी को धन, वैभव और समृद्धि की देवी माना जाता है। मां महाकाली शक्ति और बुराई के विनाश का प्रतीक हैं, जबकि मां महासरस्वती ज्ञान, बुद्धि और कला की देवी हैं।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, ये तीनों देवियां सृष्टि के निर्माण, पालन और संहार की शक्तियों का प्रतिनिधित्व करती हैं। इसलिए यहां आने वाले भक्त धन-संपत्ति के साथ-साथ शक्ति, ज्ञान और सुख-शांति का आशीर्वाद भी मांगते हैं।

दीपावली के अवसर पर मां महालक्ष्मी के दर्शन का विशेष महत्व माना जाता है। इस दौरान मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना होती है और बड़ी संख्या में श्रद्धालु माता के दर्शन के लिए पहुंचते हैं। नवरात्रि में भी यहां का माहौल भक्तिमय हो जाता है। मंदिर को फूलों और रोशनी से सजाया जाता है।

--आईएएनएस

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