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दौड़ में तीन सेकंड पीछे रहने पर दिव्यांग अभ्यर्थी को किया था डिस्क्वालिफाई, हाई कोर्ट ने नियुक्ति का दिया आदेश

रांची, 4 नवंबर (आईएएनएस)। दौड़ पूरी करने में महज तीन सेकंड की देरी एक दिव्यांग अभ्यर्थी के लिए सरकारी नौकरी और बेरोजगारी के बीच का अंतर बन गई थी। लिखित परीक्षा पास करने के बावजूद उसे चौकीदार नियुक्ति की दौड़ से बाहर कर दिया गया। अब झारखंड हाई कोर्ट ने इस मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि दिव्यांग अभ्यर्थी को उचित सुविधा दिए बिना केवल तीन सेकंड की देरी के आधार पर नियुक्ति से वंचित नहीं किया जा सकता।
 

रांची, 4 नवंबर (आईएएनएस)। दौड़ पूरी करने में महज तीन सेकंड की देरी एक दिव्यांग अभ्यर्थी के लिए सरकारी नौकरी और बेरोजगारी के बीच का अंतर बन गई थी। लिखित परीक्षा पास करने के बावजूद उसे चौकीदार नियुक्ति की दौड़ से बाहर कर दिया गया। अब झारखंड हाई कोर्ट ने इस मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि दिव्यांग अभ्यर्थी को उचित सुविधा दिए बिना केवल तीन सेकंड की देरी के आधार पर नियुक्ति से वंचित नहीं किया जा सकता।

अदालत ने अभ्यर्थी को नियुक्ति का हकदार मानते हुए राज्य सरकार को आठ सप्ताह के भीतर नियुक्ति पत्र जारी करने का निर्देश दिया है। मामला दुमका जिले में विज्ञापन संख्या 01/2025 के तहत चौकीदार के 328 पदों पर नियुक्ति से जुड़ा है। याचिकाकर्ता दिव्यांग श्रेणी से आते हैं और लिखित परीक्षा में सफल हुए थे। इसके बाद आयोजित शारीरिक परीक्षा में उन्हें सामान्य अभ्यर्थियों के साथ दौड़ में शामिल किया गया। आरोप है कि दौड़ के दौरान उन्हें दिव्यांगता के अनुरूप न तो अतिरिक्त समय दिया गया और न ही कोई विशेष सुविधा उपलब्ध कराई गई।

उन्होंने 10 मिनट 3 सेकंड में दौड़ पूरी की, लेकिन निर्धारित समय से महज तीन सेकंड अधिक होने के कारण उन्हें अयोग्य घोषित कर दिया गया। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता शुभम मिश्रा ने अदालत में दलील दी कि दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 की धारा 2(वाई) और धारा 20 के तहत दिव्यांग व्यक्तियों को उचित सुविधा उपलब्ध कराना सरकार की वैधानिक जिम्मेदारी है।

उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के फैसले 'विकास कुमार बनाम संघ लोक सेवा आयोग' का भी हवाला दिया, जिसमें उचित सुविधा को दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकारों से जोड़कर देखा गया है। राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि भर्ती नियमों में अतिरिक्त समय देने का कोई प्रावधान नहीं है। हालांकि, हाई कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया।

अदालत ने कहा कि कोई नियम या सरकारी अधिसूचना संसद द्वारा बनाए गए कानून के प्रावधानों के विपरीत नहीं हो सकती। दिव्यांग अभ्यर्थी को उचित सुविधा से वंचित करना कानून की भावना के अनुरूप नहीं है। अदालत ने यह तथ्य भी ध्यान में रखा कि दुमका में दिव्यांग श्रेणी के लिए आरक्षित 13 पदों में से 11 रिक्त हैं। इसके बाद याचिकाकर्ता को नियुक्ति का हकदार घोषित करते हुए आठ सप्ताह के भीतर नियुक्ति पत्र जारी करने का आदेश दिया।

--आईएएनएस

एसएनसी/डीकेपी