Aapka Rajasthan

'क्राउन रिप्रेजेंटेटिव पुलिस' से शुरू हुआ सीआरपीएफ का सफर ; सरदार पटेल की कल्पना ने दी नई दिशा, रखी गई थी आंतरिक सुरक्षा की मजबूत नींव

नई दिल्ली, 26 जुलाई (आईएएनएस)। केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) की स्थापना के दिन से ही इसका इतिहास वीरता भरे कारनामों और शौर्य गाथाओं से भरा हुआ है। यह बल इसकी कार्यप्रणाली और गतिविधियों की दृष्टि से राज्यों के डकैती रोधी ऑपरेशनों और आंतरिक कानून-व्यवस्था बनाए रखने के उद्देश्यों मात्र के लिए न सिर्फ पुलिस बल रहा है, बल्कि आज इसकी ड्यूटी आतंकवाद और विद्रोहियों से मुकाबले के लिए इसके मूल कार्यक्षेत्र से परे और अधिक बढ़ती जा रही है। ड्यूटी के लिए दृढ़ निष्ठा की गाथा, कुछ शानदार उपलब्धियां और बलिदानों की दास्तान भविष्य में लंबे समय तक बल के सदस्यों को प्रेरित करती रहेगी।
 

नई दिल्ली, 26 जुलाई (आईएएनएस)। केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) की स्थापना के दिन से ही इसका इतिहास वीरता भरे कारनामों और शौर्य गाथाओं से भरा हुआ है। यह बल इसकी कार्यप्रणाली और गतिविधियों की दृष्टि से राज्यों के डकैती रोधी ऑपरेशनों और आंतरिक कानून-व्यवस्था बनाए रखने के उद्देश्यों मात्र के लिए न सिर्फ पुलिस बल रहा है, बल्कि आज इसकी ड्यूटी आतंकवाद और विद्रोहियों से मुकाबले के लिए इसके मूल कार्यक्षेत्र से परे और अधिक बढ़ती जा रही है। ड्यूटी के लिए दृढ़ निष्ठा की गाथा, कुछ शानदार उपलब्धियां और बलिदानों की दास्तान भविष्य में लंबे समय तक बल के सदस्यों को प्रेरित करती रहेगी।

आंतरिक सुरक्षा के लिए केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) भारत संघ का प्रमुख केंद्रीय पुलिस बल है। यह सबसे पुराना केंद्रीय अर्द्ध सैनिक बल में से एक है, जिसे 1939 में क्राउन रिप्रजेंटेटिव पुलिस के रूप में गठित किया गया था। क्राउन रिप्रजेंटेटिव पुलिस की ओर से भारत की तत्कालीन रियासतों में आंदोलनों, राजनीतिक अशांति और साम्राज्यिक नीति के रूप में कानून व्यवस्था बनाए रखने में लगातार सहायता करने की इच्छा के मद्देनजर, 1936 में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के मद्रास संकल्प के मद्देनजर सीआरपीएफ की स्थापना की गई।

आजादी के बाद 28 दिसंबर, 1949 को संसद के एक अधिनियम के जरिए इस बल का नाम केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल दिया गया था। तत्कालीन गृह मंत्री सरदार बल्लभ भाई पटेल ने नव स्वतंत्र राष्ट्र की बदलती जरूरतों के अनुसार इस बल के लिए एक बहुआयामी भूमिका की कल्पना की थी।

1950 से पहले भुज, तत्कालीन पटियाला और पूर्वी पंजाब राज्य संघ (पीईपीएसयू) व चंबल के बीहड़ों के सभी इलाकों से सीआरपीएफ की सैन्य टुकड़ियों के प्रदर्शन की सराहना की गई। भारत संघ में रियासतों के एकीकरण के दौरान बल ने एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जूनागढ़ की विद्रोही रियासत और गुजरात में कठियावाड़ की छोटी रियासत, जिसने भारतीय संघ में शामिल होने के लिए मना कर दिया था, को अनुशासित करने में इस बल ने केंद्र सरकार की मदद की।

आजादी के तुरंत बाद कच्छ, राजस्थान और सिंध सीमाओं में घुसपैठ और सीमा पार अपराधों की जांच के लिए सीआरपीएफ की टुकड़ियों को भेजा गया। तत्पश्चात पाकिस्तानी घुसपैठियों की ओर से शुरू किए गए हमलों के बाद इनको जम्मू-कश्मीर की पाकिस्तानी सीमा पर तैनात किया गया। भारत के हॉट स्प्रिंग (लद्दाख) पर पहली बार 21 अक्तूबर 1959 को चीनी हमले को सीआरपीएफ ने नाकाम किया। सीआरपीएफ के एक छोटे से गश्ती दल पर चीन की ओर से घात लगाकर हमला किया गया, जिसमें बल के दस जवानों ने देश के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया। उनकी शहादत की याद में देश भर में हर साल 21 अक्टूबर को पुलिस स्मृति दिवस के रूप में मनाया जाता है।

1962 के चीनी आक्रमण के दौरान एक बार फिर सीआरपीएफ ने अरुणाचल प्रदेश में भारतीय सेना को सहायता प्रदान की। इस आक्रमण के दौरान सीआरपीएफ के 8 जवान शहीद हुए। पश्चिमी और पूर्वी दोनों सीमाओं पर 1965 और 1971 में भारत-पाकिस्तान युद्ध में भी बल ने भारतीय सेना के साथ कंधे से कंधा मिलाकर संघर्ष किया।

भारत में अर्द्ध सैनिक बलों के इतिहास में पहली बार महिलाओं की 1 टुकड़ी सहित सीआरपीएफ की 13 कंपनियों को आतंकवादियों से लड़ने के लिए भारतीय शांति सेना के साथ श्रीलंका में भेजा गया। इसके अलावा, संयुक्त राष्ट्र शांति सेना के एक अंग के रूप में सीआरपीएफ के कर्मियों को हैती, नामीबीया, सोमालिय और मालद्वीव के लिए वहां की कानून और व्यवस्था की स्थिति से निपटने के लिए भेजा गया।

70 के दशक के बाद जब उग्रवादी तत्वों की ओर से त्रिपुरा और मणिपुर में शांति भांग की गई तो वहां सीआरपीएफ बटालियनों को तैनात किया गया था। इसी दौरान ब्रह्मपुत्र घाटी में भी अशांति थी। सीआरपीएफ की ताकत न सिर्फ कानून और व्यवस्था बनाए रखने के लिए बल्कि संचार तंत्र व्यवधान मुक्त रखने के लिए भी शामिल किया गया। पूर्वोत्तर में विद्रोह की स्थिति से निपटने के लिए इस बल की प्रतिबद्धता लगातार उच्च स्तर पर है। 80 के दशक से पहले पंजाब में जब आतंकवाद छाया हुआ था, तब राज्य सरकार ने बड़े स्तर पर सीआरपीएफ की तैनाती की मांग की थी।

जब 13 दिसंबर 2001 को आतंकवादियों की ओर से भारतीय संसद पर आत्मघाती हमला किया गया, वो वक्त सीआरपीएफ के जवानों को उनके साहस का परिचय देने का था। सीआरपीएफ और आतंकवादियों के बीच 30 मिनट तक चली। आखिर में सीआरपीएफ जवानों ने 5 आतंकवादियों को ढेर करते हुए इस हमले को नाकाम किया।

देश की आंतरिक सुरक्षा में सीआरपीएफ का योगदान सिर्फ यहां तक सीमित नहीं रहा है। 5 जुलाई 2005 को जब 5 सशस्त्र आतंकवादियों ने अयोध्या में राम जन्म भूमि परिसर को ध्वस्त करने और बाहरी सुरक्षा रिंग को भेदने का प्रयास किया, तब आंतरिक सुरक्षा रिंग में तैनात सीआरपीएफ जवानों ने उन्हें चुनौती दी। हमारे जवान बहादुरी से लड़े और उन्होंने आतंकवादियों के नापाक इरादों को विफल करते हुए उन्हें सफलतापूर्वक मौके पर ही मार गिराया।

--आईएएनएस

डीसीएच/पीएम