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सीमा पर लोहे की दीवार बनकर खड़े टी-72 और टी-90 टैंक जमीनी युद्ध में जरूरी हैं : राजनाथ सिंह

नई दिल्ली, 27 अगस्त (आईएएनएस)। रक्षा राजनाथ सिंह ने गुरुवार को जबलपुर में टैंकों के नवीनीकरण की परियोजना के शिलान्यास पर कहा कि हमारी भारतीय सेना दुनिया की सबसे शक्तिशाली सेनाओं में से एक है। ऐसे में हमारी जरूरतें भी बहुत ज्यादा होती हैं। जमीनी युद्ध में, टी-72 और टी-90 संस्करण के टैंक हमारे लिए बहुत जरूरी हैं।
 

नई दिल्ली, 27 अगस्त (आईएएनएस)। रक्षा राजनाथ सिंह ने गुरुवार को जबलपुर में टैंकों के नवीनीकरण की परियोजना के शिलान्यास पर कहा कि हमारी भारतीय सेना दुनिया की सबसे शक्तिशाली सेनाओं में से एक है। ऐसे में हमारी जरूरतें भी बहुत ज्यादा होती हैं। जमीनी युद्ध में, टी-72 और टी-90 संस्करण के टैंक हमारे लिए बहुत जरूरी हैं।

उन्होंने कहा, "ये टैंक हमारी सीमाओं पर लोहे की दीवार बनकर खड़े हैं। आज दुनिया भारत को देखने का नजरिया बदल रही है और इसके पीछे आत्मनिर्भर भारत के लिए हमारे प्रयास जिम्मेदार हैं। भारत का रक्षा क्षेत्र अब आत्मनिर्भर होने की ओर बढ़ चुका है। रक्षा मंत्री ने बताया कि टैंक की भूमिका समाप्त नहीं हुई है। टैंक की भूमिका विकसित हो रही है। यानी तकनीक बदल रही है, युद्ध का स्वरूप बदल रहा है, लेकिन जमीनी लड़ाई में टैंकों की आवश्यकता समाप्त नहीं हुई है और यही बात हमारी रक्षा नीति को भी दिशा दे रही है।

रक्षा मंत्री ने कहा, ''भारत का रक्षा क्षेत्र, अब पूर्ण रूप से आत्मनिर्भर होने की ओर बढ़ रहा है। पिछले 10 वर्षों में हमने जो मेहनत की है, उसका परिणाम आज हमें मिल रहा है। 2014 में हमारा घरेलू रक्षा उत्पादन, मात्र 46,000 करोड़ रुपये था, यानि हम लोग भारत में सिर्फ 46,000 करोड़ रुपए के हथियार और साजो-सामान बना पाते थे। लेकिन आज वही बढ़कर रिकॉर्ड 1 लाख 77 हजार करोड़ रुपए से भी अधिक हो चुका है। इसके अलावा 2014 के समय भारत का रक्षा निर्यात बहुत कम हुआ करता था। हम 1,000 करोड़ रुपए से कम के हथियार और साजो-सामान, दुनिया को बेच पाते थे, लेकिन आज वही बढ़कर रिकॉर्ड 38,424 करोड़ रुपए तक पहुंच गया है। दुनिया भारत को एक विनिर्माण शक्ति, प्रौद्योगिकी साझेदार और विश्वसनीय रक्षा साझेदार के रूप में देख रही है।''

राजनाथ सिंह ने कहा, "आज जिस परियोजना का भूमि पूजन हुआ है, उसके तहत, यहां जबलपुर में हर साल 80 टैंकों के नवीनीकरण की अतिरिक्त क्षमता स्थापित की जाएगी। जब यह परियोजना पूरी हो जाएगी, तो भारी वाहन कारखाना अवाडी की 150 टैंकों की क्षमता और वाहन कारखाना जबलपुर की 80 टैंकों की क्षमता मिलकर, हर साल 230 टैंकों का नवीनीकरण कर सकेंगी। इससे हमारी सेना को अपनी जरूरत के अनुसार, समय पर टैंक मिल सकेंगे। मुझे खुशी है कि 472 करोड़ रुपए की लागत वाली इस परियोजना में, हमारे स्थानीय प्रतिभा और तकनीकी कार्यबल को भी अवसर मिलेगा। हमारे युवाओं में कौशल की कमी नहीं है। आवश्यकता है उन्हें अवसर, प्रौद्योगिकी और सही पारिस्थितिकी तंत्र देने की। जब ये तीनों चीजें हमारे युवाओं को मिलेंगी, तो वही युवा राष्ट्र निर्माण के सबसे महत्वपूर्ण कारक बनेंगे।''

उन्होंने कहा कि पिछले 40 वर्षों से, भारी वाहन कारखाना यानी एचवीएफ ने भारतीय सेना को लगभग 4,400 टैंकों की आपूर्ति की है। यह आंकड़ा अपने आप में गर्व करने लायक है। ये टैंक आज भी हमारी सीमाओं पर दुश्मन के लिए काल बनकर खड़े हैं और हमारे जवानों का मनोबल बनकर खड़े हैं।

रक्षा मंत्री ने कहा कि हमारा दृष्टिकोण किसी एक मंच को दूसरे मंच का विकल्प मानना नहीं है। हमें ड्रोन भी चाहिए, हमें मिसाइल भी चाहिए, हमें तोपखाना भी चाहिए, हमें इलेक्ट्रॉनिक युद्ध भी चाहिए, ऊर्जा हथियार भी चाहिए और हमें आधुनिकीकरण किए गए टैंक भी चाहिए। हमें यह तय नहीं करना है कि टैंक चाहिए या ड्रोन; हमें यह सुनिश्चित करना है कि हमारे सैनिकों के पास टैंक भी हों, ड्रोन भी हों और दोनों के बीच बेहतर समन्वय भी हो। मुझे विश्वास है कि जबलपुर की यह सुविधा आने वाले समय में इसी दृष्टिकोण को आगे बढ़ाएगी।

उन्होंने कहा कि यह परियोजना हमारे उन सैनिकों के लिए एक वरदान सिद्ध होगी, जो इन टैंकों के सहारे दुश्मनों को नेस्तनाबूद करते हैं, और सबसे बड़ी बात यह है कि यह परियोजना जबलपुर और आसपास के क्षेत्रों के स्थानीय लोगों, हमारे किसानों, हमारे मजदूरों, हमारे युवाओं और हमारे छोटे उद्यमियों के जीवन में भी, समृद्धि और रोजगार के नए दरवाजे खोलने वाली है। ग्वालियर-चंबल क्षेत्र में 3,073 हेक्टेयर भूमि पर रक्षा विनिर्माण की संभावनाएं और 16,960 करोड़ रुपए से अधिक के प्रस्तावित निवेश इस दिशा में राज्य की महत्त्वाकांक्षी सोच को दर्शाते हैं। यह प्रयास मध्यप्रदेश को भारत का अगला प्रमुख रक्षा एवं एयरोस्पेस विनिर्माण केंद्र बनाने की मजबूत नींव रख रहा है।

--आईएएनएस

जीसीबी/एसके