कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने लोकसभा में दलबदल विरोधी कानून पर चर्चा की मांग की
नई दिल्ली, 5 अगस्त (आईएएनएस)। कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने लोकसभा सचिव को पत्र भेजकर लोकसभा में स्थगन प्रस्ताव का नोटिस दिया है। सांसद ने दलबदल विरोधी कानून के स्वरूप पर चर्चा करने की मांग की है।
लोकसभा महासचिव को लिखे पत्र में मनीष तिवारी ने कहा, "मैं तत्काल महत्व के एक निश्चित विषय पर चर्चा करने के उद्देश्य से सदन की कार्यवाही स्थगित करने का प्रस्ताव पेश करने की अनुमति मांगने के अपने इरादे की सूचना देता हूं। मेरा प्रस्ताव है कि यह सदन प्रश्नकाल, शून्यकाल और दिन के अन्य सभी निर्धारित कार्यों को स्थगित करे ताकि एक नए दलबदल विरोधी कानून के स्वरूप पर चर्चा की जा सके।"
मनीष तिवारी ने कहा, "यह कानून अवसरवाद से प्रेरित और बिना किसी वास्तविक वैचारिक या नीतिगत मतभेद के बड़े पैमाने पर होने वाले राजनीतिक दल-बदल को रोके और साथ ही संसद व विधानसभाओं के भीतर और बाहर ईमानदार और आलोचनात्मक असहमति के लिए भी गुंजाइश रखे। इसलिए, मैं सरकार से आग्रह करता हूं कि आज की कार्यवाही स्थगित की जाए और तत्काल महत्व के इस विषय पर पूरी चर्चा की अनुमति दी जाए।"
इसके पहले 28 जुलाई को कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने लोकसभा में स्थगन प्रस्ताव का नोटिस दिया था। उन्होंने 20 जुलाई को संसद तक छात्रों के मार्च के दौरान रैपिड एक्शन फोर्स (आरएएफ) के जवानों द्वारा कथित तौर पर पैलेट गन के इस्तेमाल पर चर्चा की मांग की गई थी। उन्होंने कहा था कि परीक्षा के पेपर लीक होने के आरोपों के विरोध में आयोजित इस प्रदर्शन में 80 से ज्यादा लोग घायल हो गए थे।
लोकसभा के महासचिव को संबोधित अपने नोटिस में तिवारी ने सदन से निर्धारित कार्यवाही स्थगित करने और इस मुद्दे को अत्यावश्यक जनहित का मामला मानते हुए इस पर विचार करने का आग्रह किया था। कांग्रेस नेता ने नोटिस में कहा था, "मैं सदन की कार्यवाही स्थगित करने के लिए एक प्रस्ताव लाने की अनुमति का अनुरोध करता हूं, ताकि एक अत्यावश्यक मामले पर चर्चा की जा सके।"
पत्र में मनीष तिवारी ने लिखा था, "मैं प्रस्ताव रखता हूं कि यह सदन प्रश्न काल, शून्य काल और दिन के अन्य सभी निर्धारित कामकाज को स्थगित करे ताकि 20 जुलाई, 2026 को संसद तक मार्च के दौरान निहत्थे छात्र प्रदर्शनकारियों पर रैपिड एक्शन फोर्स द्वारा पैलेट गन के कथित इस्तेमाल पर चर्चा की जा सके, जिसमें 80 से ज़्यादा लोग घायल हो गए थे। शांतिपूर्ण प्रदर्शन पर कम से कम बल का प्रयोग किया जाना चाहिए था, फिर भी नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन करते हुए अत्यधिक बल का प्रयोग किया गया, जिससे अधिकारियों की जवाबदेही और पीड़ितों को मुआवजा देने के मुद्दे पर तत्काल संसदीय चर्चा जरूरी हो गई है।"
--आईएएनएस
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