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क्लाइमेट चेंज से मुकाबले की तैयारी, हर गांव तक पहुंचेगी आधुनिक कृषि मशीनरी: शिवराज सिंह चौहान

नई दिल्ली, 11 अप्रैल (आईएएनएस)। केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण और ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि बदलते मौसम और जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों के बीच केंद्र सरकार का लक्ष्य है कि हर क्षेत्र के किसानों को उन्नत किस्में, सही फसल अनुशंसा, और आधुनिक कृषि यंत्रों की सुलभ सुविधा एक साथ उपलब्ध कराई जाए, ताकि वे कम लागत में, अधिक उत्पादन के साथ सुरक्षित और टिकाऊ खेती कर सकें। यह बात उन्होंने आज उन्नत कृषि महोत्सव के अवसर पर मीडिया से अनौपचारिक चर्चा के दौरान कही।
 
क्लाइमेट चेंज से मुकाबले की तैयारी, हर गांव तक पहुंचेगी आधुनिक कृषि मशीनरी: शिवराज सिंह चौहान

नई दिल्ली, 11 अप्रैल (आईएएनएस)। केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण और ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि बदलते मौसम और जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों के बीच केंद्र सरकार का लक्ष्य है कि हर क्षेत्र के किसानों को उन्नत किस्में, सही फसल अनुशंसा, और आधुनिक कृषि यंत्रों की सुलभ सुविधा एक साथ उपलब्ध कराई जाए, ताकि वे कम लागत में, अधिक उत्पादन के साथ सुरक्षित और टिकाऊ खेती कर सकें। यह बात उन्होंने आज उन्नत कृषि महोत्सव के अवसर पर मीडिया से अनौपचारिक चर्चा के दौरान कही।

उन्होंने कहा कि क्लाइमेट चेंज (जलवायु परिवर्तन) अब बहुत प्रॉमिनेंट हो चुका है और बेमौसम बारिश, वेस्टर्न डिस्टर्बेंस, तथा तापमान में अनिश्चितता के कारण खेती पर सीधा असर पड़ रहा है। उन्होंने बताया कि वैज्ञानिक संस्थान ऐसी फसल किस्में विकसित कर रहे हैं, जो अधिक गर्मी भी सह सकें, ज्यादा पानी की स्थिति में भी टिकाऊ रहें, और कम पानी की स्थिति में भी अच्छा प्रदर्शन कर सकें। इन किस्मों को तेजी से किसानों तक पहुंचाने के प्रयास जारी हैं।

केंद्रीय मंत्री ने स्पष्ट किया कि सरकार का फोकस केवल व्यक्तिगत मशीन सब्सिडी तक सीमित नहीं, बल्कि गांव स्तर पर साझा उपयोग के लिए कस्टम हायरिंग सेंटर और फार्म मशीनरी बैंक का नेटवर्क विकसित करना है। उन्होंने कहा कि पंचायतों, किसान समूहों, एफपीओ और स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से ऐसे सेंटर स्थापित किए जा रहे हैं, जहां से छोटे और सीमांत किसान भी कराये पर आधुनिक कृषि उपकरण ले सकें। उन्होंने बताया कि केंद्र की सब-मिशन ऑन एग्रीकल्चरल मेकनाइजेशन (एसएमएएस) जैसी योजनाओं के तहत परियोजना लागत पर 40 से 80 प्रतिशत तक वित्तीय सहायता उपलब्ध कराई जा रही है, ताकि लगभग 30 लाख रुपए तक की परियोजनाओं पर भी पंचायतों और किसान संगठनों को मजबूत समर्थन मिल सके।

एमपी लैड्स (एमपीएलएडीएस) की निधि से भी क्या कस्टम हायरिंग सेंटर जिम की तरह बनवाए जा सकते हैं? इस सवाल का जवाब देते हुए चौहान ने साफ कहा कि एमपी लैड्स का उद्देश्य स्थायी सामुदायिक परिसंपत्ति बनाना है, जैसे सड़कें, स्कूल, स्वास्थ्य, खेल सुविधाएं और स्थिर जिम आदि, जबकि कस्टम हायरिंग सेंटर संचालन और किराए के मॉडल पर आधारित होते हैं, जिनके लिए अलग प्रकार की व्यवस्था और संचालन ढांचा चाहिए। उन्होंने कहा कि कस्टम हायरिंग सेंटरों को हम एमपीएलएडीएस से नहीं, बल्कि कृषि मशीनीकरण और संबंधित योजनाओं से ही बढ़ावा दे रहे हैं, ताकि नीति की भावना और पारदर्शिता दोनों बनी रहे।

चौहान ने यह भी कहा कि भले ही एमपी लैड्स से सीधे कस्टम हायरिंग सेंटर न बनते हों, लेकिन सांसद और विधायक अपने क्षेत्रों में कृषि मशीनीकरण योजनाओं के बेहतर क्रियान्वयन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। वे किसान समूहों, एफपीओ और पंचायतों के प्रस्तावों को राज्य और केंद्र सरकार के समक्ष प्रभावी ढंग से उठाकर, स्वीकृति, निगरानी और समस्याओं के समाधान में सहयोग कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि जनप्रतिनिधियों की सक्रियता से ही योजनाओं का लाभ सही मायने में अंतिम छोर के किसान तक पहुंचता है।

कस्टम हायरिंग मॉडल में प्राइवेट सेक्टर की सीमित भागीदारी पर पूछे गए सवाल पर मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि कुछ राज्यों में निजी कंपनियां और उद्यमी पहले से ही आगे आकर काम कर रहे हैं और जहां‑जहां स्थिर मांग, स्पष्ट नीति और स्थानीय साझेदारी मिलती है, वहां यह मॉडल सफल होता है। उन्होंने कहा कि सरकार की कोशिश है कि एफपीओ, पंचायत और प्राइवेट सेक्टर मिलकर पब्लिक–प्राइवेट पार्टनरशिप के रूप में ऐसे केंद्र विकसित करें, ताकि मशीनें भी चलती रहें और किसान को सस्ती और समय पर सेवा भी मिल सके।

आगे चौहान ने जोर देकर कहा कि यह पूरी पहल किसी मजबूरी से नहीं, बल्कि किसान‑केंद्रित सोच, जनमत और वैज्ञानिक सलाह का परिणाम है। उन्होंने कहा कि पहले भी कई योजनाएं चल रही थीं, लेकिन अब उद्देश्य उन्हें एग्रो‑क्लाइमेटिक दृष्टिकोण, आधुनिक मशीनीकरण, क्लाइमेट‑रेजिलिएंस और बाजार से जुड़ी रणनीति के साथ जोड़कर समग्र रोडमैप में बदलना है, ताकि उत्पादकता बढ़े, लागत घटे और किसान की आमदनी सुरक्षित व स्थिर हो सके।

--आईएएनएस

डीके/डीकेपी