चीन की पीएलए तैनाती में कमी के बीच सतर्कता जरूरी, भारत को ढील नहीं देनी चाहिए: प्रमोद सहगल
नई दिल्ली, 14 सितंबर (आईएएनएस)। चीन की ओर से एलएली पर सेना की तैनाती में कमी की रिपोर्ट में उत्तरी सीमाओं पर चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) की तैनाती में कमी और राजनीतिक, कूटनीतिक तथा सैन्य स्तर पर बातचीत के जरिए सीमा पर स्थिरता बढ़ने की बात सामने आने के बाद रिटायर्ड मेजर जनरल प्रमोद सहगल ने भारत को सतर्क रहने की सलाह दी है। उन्होंने कहा कि भारत-चीन संबंधों में सुधार के संकेतों का स्वागत किया जाना चाहिए, लेकिन चीन के साथ व्यवहार में भारत को अपनी रक्षा तैयारियों, सैन्य तैनाती और सीमा अवसंरचना में किसी तरह की ढील नहीं देनी चाहिए।
मेजर जनरल सहगल ने कहा कि रक्षा मंत्रालय की रिपोर्ट और हालिया कूटनीतिक घटनाक्रमों को व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखने की जरूरत है। ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग का भारत आना भी दोनों देशों के संबंधों को स्थिर करने की दिशा में एक राजनीतिक संकेत के रूप में देखा जा सकता है। मौजूदा समय में चीन दक्षिण चीन सागर और पूर्वी चीन सागर समेत कई मोर्चों पर अंतरराष्ट्रीय दबाव का सामना कर रहा है और वह भारत के साथ तनाव को और बढ़ाना नहीं चाहता। भारत की ओर से भी यह स्पष्ट किया गया है कि दोनों देशों के संबंधों में वास्तविक सुधार तभी संभव है जब सीमा पर शांति और स्थिरता बनी रहे और वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर किसी प्रकार की गड़बड़ी न हो। वर्ष 2020 के बाद भारत-चीन संबंधों की प्रकृति बदल चुकी है और केवल राजनीतिक बयानों के आधार पर सुरक्षा नीति में बदलाव नहीं किया जाना चाहिए।
रिटायर्ड मेजर जनरल ने चीन की सैन्य और परिवहन क्षमता का उल्लेख करते हुए कहा कि चीन को सीमा क्षेत्रों में बेहतर सड़क, रेल और अन्य संचार सुविधाओं का लाभ मिलता है। चीन अपनी आरक्षित सैन्य टुकड़ियों को अपेक्षाकृत कम समय में अग्रिम क्षेत्रों तक पहुंचाने की क्षमता रखता है, जबकि भारत को कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के कारण अपनी सैन्य संरचनाओं की आवाजाही में अधिक समय लग सकता है। यदि चीन भविष्य में अपनी कुछ सैन्य टुकड़ियों को पीछे हटाता भी है, तब भी उसके पास बेहतर संचार और परिवहन नेटवर्क के कारण उन्हें दोबारा आगे लाने की क्षमता मौजूद है। ऐसे में भारत को अपनी सैन्य तैनाती, सीमा अवसंरचना और फोर्स मॉडर्नाइजेशन की गति बनाए रखनी चाहिए।
सहगल ने कहा कि भारत को चीन या किसी भी बयान को केवल उसके घोषित स्वरूप के आधार पर नहीं देखना चाहिए। सीमा सुरक्षा के मामले में लगातार तैयारी और सतर्कता आवश्यक है। उन्होंने कहा कि कुछ क्षेत्रों में सैनिकों के पीछे हटने या डिसइंगेजमेंट की प्रक्रिया को पूर्ण सैन्य तनाव समाप्त होने के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। उनके मुताबिक, सैनिकों का डिसइंगेजमेंट, डी-एस्केलेशन और डी-इंडक्शन अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं।
सहगल ने गलवान संघर्ष के बाद की परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए कहा कि पिछले अनुभवों से भारत को यह सीख लेनी चाहिए कि सीमा पर किसी भी प्रकार की सुरक्षा ढील भविष्य में चुनौती पैदा कर सकती है। भारत को अपनी फॉरवर्ड पोजीशन, सैन्य तैयारी और आधुनिक हथियारों के विकास में किसी तरह की कमी नहीं आने देनी चाहिए।
रिपोर्ट में राजनीतिक, कूटनीतिक और सैन्य स्तर पर बातचीत से उत्तरी सीमा पर स्थिरता बढ़ने का उल्लेख किया गया है। इस पर मेजर जनरल सहगल ने कहा कि सीमा प्रबंधन और कॉन्फिडेंस बिल्डिंग मेजर्स के तहत हुई बातचीत सकारात्मक कदम हैं। उन्होंने बताया कि विभिन्न सेक्टरों में नए हॉटलाइन और बैठक तंत्र स्थापित करने जैसे प्रयासों का उद्देश्य स्थानीय स्तर पर उत्पन्न होने वाले तनाव को समय रहते सुलझाना है, ताकि छोटी घटनाएं बड़े सैन्य टकराव का रूप न ले सकें। कोर कमांडर स्तर की बातचीत और नए संचार माध्यम भविष्य में गलतफहमियां कम करने में सहायक हो सकते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि इन उपायों के बावजूद भारत को चीन की सीमा संबंधी नीतियों और दावों को लेकर सतर्क रहना होगा। संवाद और सैन्य तैयारी—दोनों को साथ-साथ आगे बढ़ाने की आवश्यकता है।
ऑपरेशन सिंदूर के संदर्भ में सहगल ने कहा कि इस अभियान के दौरान भारत ने अपनी खुफिया क्षमता, तकनीकी दक्षता और सेना, वायुसेना और नौसेना के बीच संयुक्त तैयारी का प्रदर्शन किया। उन्होंने कहा कि ऐसे अभियानों से जहां भारत की क्षमताएं सामने आती हैं, वहीं कुछ कमियों की पहचान भी होती है। भारतीय सशस्त्र बल इन कमियों को दूर करने के लिए लगातार आधुनिकीकरण पर काम कर रहे हैं। ड्रोन तकनीक, आधुनिक हथियार प्रणालियों और अन्य फोर्स मल्टीप्लायर्स को शामिल करने की दिशा में कदम उठाए जा रहे हैं।
सहगल ने आगे कहा कि भविष्य की चुनौतियों को देखते हुए भारत को हर संभावित परिस्थिति के लिए तैयार रहना चाहिए। उन्होंने विशेष रूप से इस बात पर जोर दिया कि यदि कभी एक से अधिक मोर्चों पर सुरक्षा चुनौती उत्पन्न होती है, तो भारत की सैन्य तैयारियां पर्याप्त और आधुनिक होनी चाहिए।
--आईएएनएस
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