सीईसी ज्ञानेश कुमार पर बरसे थॉमस इसाक, प्रशासनिक करियर और फैसलों पर उठाए सवाल
तिरुवनंतपुरम, 25 सितंबर (आईएएनएस)। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का नाम एक बार फिर बड़े राजनीतिक विवाद के केंद्र में है। सीपीआईएम के वरिष्ठ नेता और केरल के पूर्व वित्त मंत्री थॉमस इसाक ने ज्ञानेश कुमार के पूरे प्रशासनिक करियर पर सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया है कि केरल में पीडब्ल्यूडी सचिव रहते हुए एक मलेशियाई कंपनी के इंजीनियर की आत्महत्या के मामले में सुसाइड नोट में नाम आने के बाद उन्हें पद से हटाया गया था और विजिलेंस जांच बैठाई गई थी।
सीपीआईएम नेता थॉमस इसाक ने कहा, "ज्ञानेश कुमार केरल कैडर के आईएएस अधिकारी थे और उन्हें केरल को एक बहुत गंभीर मामले में छोड़ना पड़ा था। 2006 में ई.एस. सच्चिदानंद के वामपंथी सरकार के सत्ता में आने पर वे पीडब्ल्यूडी के प्रभारी थे। पीडब्ल्यूडी विश्व बैंक द्वारा वित्त पोषित केरल राज्य सड़क विकास कार्यक्रम लागू कर रहा था। एक मलेशियाई कंपनी ने राज्य राजमार्ग के एक विशेष हिस्से के लिए अनुबंध किया था और निर्माण फर्म के प्रभारी अभियंता, कुआलालंपुर जाने के बाद आत्महत्या कर ली। उन्होंने एक सुसाइड नोट छोड़ा जिसमें उन्होंने ज्ञानेश कुमार का नाम लिया।"
सीपीआईएम नेता ने कहा कि उन्होंने बताया कि कैसे सरकारी अधिकारियों ने कार्यक्रम के कार्यान्वयन में इतनी बाधाएं खड़ी कीं, रिश्वतें मांगीं और उन्हें परेशान किया कि वे आत्महत्या करने पर मजबूर हो गए। जब मामला सामने आया, तो हमने उन्हें तुरंत पद से हटा दिया और सतर्कता जांच का आदेश दिया।
उन्होंने कहा कि दो-तीन महीनों के भीतर वे रक्षा विभाग के तहत केंद्रीय सेवा में जाने में कामयाब रहे। फिर वे कुछ वर्षों तक वहां रहे, जब तक कि 2011 में यूडीएफ सरकार सत्ता में नहीं आई। फिर 2012 में, वे दिल्ली में केरल हाउस के रेजिडेंट कमिश्नर बने। 2016 में वामपंथी एक बार फिर सत्ता में आए, वे फिर से केंद्रीय सेवा में चले गए। उन्होंने आरोप लगाया कि वहां वे कश्मीर राज्य को विखंडित करने में सहायक थे।
थॉमस इसाक ने कहा कि ऐसी अफवाह है कि मुझे इसके बारे में प्रत्यक्ष ज्ञान नहीं है कि वे आए, अमित शाह के पसंदीदा बन गए। उनके पास किसी राज्य को खत्म करने के शानदार विचार थे। मुझे लगता है कि वे कई ऑपरेशनों के लिए एक तरह के मास्टरमाइंड थे, उदाहरण के लिए राम जन्मभूमि मंदिर।
उन्होंने कहा कि एक बार फिर चर्चा है कि इस चतुर चाल के पीछे भी वही थे। एक ऐसा ट्रस्ट बनाना जो सार्वजनिक धन से चलता है, चाहे वह केंद्र सरकार से आए या निजी चंदे से, केंद्र सरकार जिसके बुनियादी ढांचे आदि के लिए पैसा देती है, लेकिन एक निजी ट्रस्ट होने के कारण जो आरटीआई के दायरे से भी बाहर है। अब हम इस तरह की हेराफेरी का नतीजा देख ही रहे हैं। खैर, मुझे लगता है कि राम जन्मभूमि पर मिली बड़ी सफलता के बाद पीएम मोदी और अमित शाह को लगा कि वे चुनाव आयोग के लिए सबसे उपयुक्त उम्मीदवार हैं।
थॉमस इसाक ने कहा कि वे सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले को भी दरकिनार कर गए, जिसमें कहा गया था कि चुनाव आयोग का चयन प्रधानमंत्री और नेता प्रतिपक्ष की मौजूदगी में पारदर्शी तरीके से होना चाहिए। इसलिए भारत के मुख्य न्यायाधीश को हटा दिया गया और उनकी जगह प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक मंत्री को लाया गया और ये सब कुछ सिर्फ यह सुनिश्चित करने के लिए कि ज्ञानेश कुमार चुनाव आयुक्त बनें।
उन्होंने कहा कि यह एक ऐसी सोची-समझी योजना है जिसे लोग पूरी तरह समझ नहीं पाते। पहला, उनके फैसले ने पात्रता साबित करने का बोझ आपत्ति करने वाले से हटाकर सीधे मतदाता पर डाल दिया। यह एक बहुत बड़ा बदलाव है। दूसरा, पात्रता के नियम इस तरह बनाए गए कि आम आदमी के लिए जरूरी सबूत जुटाना लगभग नामुमकिन हो गया। तीसरा, वे इससे भी एक कदम आगे निकल गए।
वहीं, सीपीआईएम के पूर्व सांसद हन्नान मोल्लाह ने कहा कि सीईसी ज्ञानेश ने जो किया है, उनका काम राष्ट्रविरोधी है, क्योंकि चुनाव में वोट देने का अधिकार वोटरों का होता है। उन्होंने इसे खराब किया है और करोड़ों वोटरों को वोटर लिस्ट से हटा दिया है। वोटिंग मैनेजमेंट, वहां जाकर राजनीतिक दलों की भूमिका को ठीक से मॉनिटर करना, उनके खर्च को देखना, यह सब उनकी जिम्मेदारी है। वह ऐसा नहीं कर रहे हैं। वह भाजपा को पूरी सुविधा दे रहे हैं और दूसरी पार्टियों के लिए जितनी हो सके उतनी मुश्किल खड़ी कर रहे हैं।"
उन्होंने कहा कि जिस तरह से उन्होंने काम किया है, वह चुनाव आयोग की पवित्रता को तोड़कर किया है। चुनाव आयोग एक बॉडी है। उसमें, उन्हें एकमत से फैसला करना होता है।
--आईएएनएस
केके/वीसी
