राष्ट्रीय मुद्राओं में व्यापार ही है समझदारी, 'ब्रिक्स साझा मुद्रा' बनी तो चीन का होगा दबदबा : केपी फैबियन
नई दिल्ली, 14 सितंबर (आईएएनएस)। पूर्व राजनयिक और रणनीतिक मामलों के विशेषज्ञ केपी फैबियन ने ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में हुई चर्चाओं को लेकर अपनी राय रखते हुए कहा कि ब्रिक्स देशों के बीच 'साझा मुद्रा' पर विचार सही नहीं है और भारत को इसका समर्थन नहीं करना चाहिए।
आईएएनएस से बात करते हुए केपी फैबियन ने कहा कि भारत और रूस के बीच 95 प्रतिशत व्यापार पहले से ही राष्ट्रीय मुद्राओं में हो रहा है। ऐसे में 'साझा मुद्रा' की जरूरत नहीं है। फैबियन के मुताबिक 'साझा मुद्रा' बनने से देशों की वित्तीय संप्रभुता खत्म होगी और उस पर चीन का दबदबा तय है।
फैबियन ने कहा कि भारतीय मीडिया में अक्सर 'डी-डॉलराइजेशन' यानी अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम करने की बात होती है। उनके अनुसार, इस विषय को इस तरह पेश करना जरूरी नहीं है और यह कूटनीतिक रूप से भी समझदारी नहीं है।
उन्होंने कहा कि डी-डॉलराइजेशन की बजाय 'राष्ट्रीय मुद्राओं' के अधिक उपयोग की बात करना ज्यादा समझदारी होगी। उन्होंने कहा कि कुछ मीडिया संस्थान अभी भी 'लोकल करेंसी' जैसी भाषा इस्तेमाल करते हैं जबकि सही शब्द 'राष्ट्रीय मुद्रा' होना चाहिए।
फैबियन के अनुसार, चीन और रूस पहले से ही अपने व्यापार का निपटारा अपनी-अपनी मुद्राओं में कर रहे हैं। वहीं भारत और रूस के बीच भी लगभग 95 प्रतिशत व्यापार राष्ट्रीय मुद्राओं में निपटाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि ब्रिक्स देशों को एक 'साझा मुद्रा' बनाने की दिशा में नहीं बढ़ना चाहिए। उनके अनुसार, चीन को छोड़कर शायद ही कोई देश ऐसी व्यवस्था चाहता हो।
उन्होंने समझाया कि अगर एक 'साझा मुद्रा' बनती है, तो देशों की अपनी आर्थिक और वित्तीय नीतियों पर नियंत्रण कम हो जाएगा। उदाहरण के लिए, वे अपनी जरूरत के अनुसार ब्याज दरों में बदलाव नहीं कर पाएंगे। यानी उनकी वित्तीय संप्रभुता प्रभावित होगी।
फैबियन ने कहा कि भारत फिलहाल ऐसी व्यवस्था के लिए तैयार नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि अगर भविष्य में कभी ब्रिक्स की साझा मुद्रा बनी भी, जिसकी संभावना उन्हें बहुत कम लगती है, तो उस पर चीन का दबदबा होना लगभग तय होगा।
उन्होंने इसका कारण बताते हुए कहा कि अब ब्रिक्स में 11 सदस्य देश हैं। इन सभी की कुल जीडीपी लगभग 34 ट्रिलियन डॉलर है, जबकि अकेले चीन की जीडीपी करीब 20 ट्रिलियन डॉलर है। इसलिए भारत को 'साझा मुद्रा' के विचार का समर्थन नहीं करना चाहिए।
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार और भारत को स्थायी सदस्यता मिलने के मुद्दे पर फैबियन ने कहा कि उनकी नजर में इस विषय पर अभी कोई खास प्रगति नहीं हुई है।
उन्होंने कहा कि अगर बयान के शब्दों को ध्यान से पढ़ा जाए, तो रूस और चीन ने केवल इतना कहा है कि वे भारत और ब्राजील की संयुक्त राष्ट्र और सुरक्षा परिषद में बड़ी भूमिका निभाने की आकांक्षाओं को स्वीकार या सराहते हैं।
फैबियन के मुताबिक, इसका यह मतलब नहीं है कि रूस और चीन ने स्पष्ट रूप से भारत और ब्राजील की सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता की दावेदारी का समर्थन कर दिया है। इसलिए इस मुद्दे पर अभी किसी बड़ी प्रगति का दावा करना सही नहीं होगा।
ब्रिक्स घोषणा-पत्र में सीमा-पार आतंकवाद पर बात करते हुए पूर्व राजनयिक केपी फैबियन ने कहा कि यह अच्छी बात है कि ब्रिक्स घोषणा-पत्र में सीमा-पार आतंकवाद की कड़ी निंदा की गई है और ऐसी भाषा का इस्तेमाल किया गया है, जिसे भारत लंबे समय से उठाता रहा है। फिर भी सिर्फ बयान देना ही काफी नहीं है। असल सवाल यह है कि जब संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में पाकिस्तान के कुछ आतंकवादी संगठनों को आधिकारिक तौर पर आतंकवादी संगठन घोषित करने का प्रस्ताव आएगा, तब क्या चीन उसमें सहयोग करेगा?
--आईएएनएस
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