ब्लडी संडे: वह दिन जब जारशाही के खिलाफ उठ खड़ा हुआ था रूस
नई दिल्ली, 8 जनवरी (आईएएनएस)। रूसी इतिहास के पन्नों पर 9 जनवरी 1905 की तारीख अपने साथ कई जख्म और बदलाव की कहानी सुनाने आती है। इस दिन "ब्लडी संडे" था। कुछ ऐसा हुआ जो केवल एक नरसंहार नहीं था, बल्कि वह मोड़ था जहां से जारशाही के पतन की शुरुआत हुई। इस घटना के बाद देशभर में हड़तालों, विद्रोहों और जन आंदोलनों की ऐसी लहर उठी, जिसने 1905 की रूसी क्रांति को जन्म दिया और आगे चलकर 1917 की रूसी क्रांति की नींव रखी गई।
उस समय रूस जार निकोलस द्वितीय के अधीन था। औद्योगीकरण तेजी से हो रहा था, लेकिन मजदूर वर्ग बेहद दयनीय परिस्थितियों में जी रहा था। कम मजदूरी, काम के लंबे घंटे, राजनीतिक अधिकारों का अभाव और रूस-जापान युद्ध में मिली हार ने जनता के असंतोष को और बढ़ा दिया था। इसी पृष्ठभूमि में पादरी जॉर्जी गैपोन के नेतृत्व में मजदूरों ने जार को एक याचिका सौंपने का निर्णय लिया।
9 जनवरी 1905 को सेंट पीटर्सबर्ग में हजारों मजदूर, महिलाएं और बच्चे शांतिपूर्ण जुलूस के रूप में विंटर पैलेस की ओर बढ़े। वे हाथों में धार्मिक प्रतीक और जार के नाम लिखी याचिकाएं लिए हुए थे। उन्हें विश्वास था कि जार उनकी पीड़ा सुनेगा। लेकिन सेना को भीड़ को रोकने का आदेश दिया गया और बिना चेतावनी गोलियां बरसा दी गईं। सैकड़ों लोग मारे गए और हजारों घायल हुए। यही घटना इतिहास में “ब्लडी संडे” कहलायी।
इस घटना का प्रभाव पूरे रूस में तुरंत दिखाई दिया। कारखानों में हड़तालें शुरू हो गईं, किसानों ने जमींदारों के खिलाफ विद्रोह किया और सेना तथा नौसेना में भी असंतोष फैल गया। इतिहासकार 'ऑरलैंडो फाइजीस' ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “ अ पीपुल्स ट्रेजेडी: द रसियन रेवोल्यूशन 1891–1924” में लिखा कि ब्लडी संडे ने आम रूसियों के मन से यह भ्रम तोड़ दिया कि जार जनता का रक्षक है। उनके अनुसार, यह दिन वह क्षण था जब जार और जनता के बीच का नैतिक रिश्ता हमेशा के लिए टूट गया।
जनदबाव के कारण जार निकोलस द्वितीय को अक्टूबर 1905 में 'ऑक्टूबर घोषणापत्र' जारी करना पड़ा, जिसमें नागरिक स्वतंत्रता और संसद जैसी संस्था ‘ड्यूमा’ की स्थापना का वादा किया गया। हालांकि ये सुधार अधूरे साबित हुए, लेकिन उन्होंने जारशाही की निरंकुश सत्ता को पहली बार सीमित किया।
ब्लडी संडे और 1905 की रूसी क्रांति को इतिहासकार आज भी उस चेतावनी के रूप में देखते हैं, जिसे अगर जारशाही ने गंभीरता से लिया होता, तो शायद 1917 की क्रांति इतनी उग्र न होती।
--आईएएनएस
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