भाजपा को 'भाजपा' बनाने वाले पार्टी के 'भीष्म पितामह' बने लालकृष्ण आडवाणी
नई दिल्ली, 7 नवंबर (आईएएनएस)। भारतीय राजनीति में कुछ नाम ऐसे होते हैं, जो किसी दल तक सीमित नहीं रहते बल्कि एक युग के प्रतीक बन जाते हैं। लालकृष्ण आडवाणी उन्हीं में से एक हैं। जनसंघ के शुरुआती दिनों से लेकर भारतीय जनता पार्टी को राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने तक आडवाणी ने न सिर्फ पार्टी को वैचारिक दिशा दी बल्कि उसे जनाधार भी दिया। कभी 'लौह पुरुष' कहे गए, तो कभी पार्टी का चेहरा लेकिन भाजपा के कार्यकर्ताओं के लिए वे हमेशा 'भीष्म पितामह' रहे।
8 नवंबर 1927 को सिंध प्रांत (पाकिस्तान) में जन्मे लालकृष्ण आडवाणी ने भारत विभाजन के बाद देश सेवा को अपना कर्मक्षेत्र चुना और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के माध्यम से राष्ट्र सेवा की राह पकड़ी। भले ही वे 1947 में देश के आजाद होने का जश्न भी नहीं मना सके। इसके पीछे की वजह यह थी कि उन्हें आजादी के महज कुछ घंटों में ही अपने घर को छोड़कर भारत रवाना होना पड़ा था। हालांकि, जब वह महज 14 साल के थे, तो उसी समय उन्होंने अपना जीवन हिंदुस्तान के नाम कर दिया।
उन्होंने जनसंघ के माध्यम से सक्रिय राजनीति में प्रवेश किया। 1990 की ऐतिहासिक राम रथयात्रा ने उन्हें जननेता के रूप में स्थापित किया। देश के भीतर बदलते राजनीतिक हालात और वैचारिक संघर्षों के बीच आडवाणी का मुखर होना भाजपा के विस्तार से जुड़ता चला गया।
भाजपा की आधिकारिक वेबसाइट पर यह जिक्र मिलता है कि अटल बिहारी वाजपेयी जो फरवरी 1968 में पार्टी के अध्यक्ष थे, 1971 के आम चुनावों के बाद पद से मुक्त होने की बात सोच रहे थे। वाजपेयी ने आडवाणी से पार्टी का अध्यक्ष बनने को कहा क्योंकि वह पहले ही चार साल पूरे कर चुके थे और अब दूसरों को मौका देना चाहते थे।
आडवाणी बार-बार मना करने पर अड़े थे क्योंकि उन्हें ऐसा लगता था कि वह अच्छे वक्ता नहीं हैं और जब जनसभा की बात आती है तो वह काफी घबरा जाते हैं, जबकि अटल बिहारी वाजपेयी अपनी वाकपटुता से आसानी से लोगों को मंत्रमुग्ध कर देते थे। अटल के समझाने पर दिसंबर 1972 में आडवाणी भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष बने।
इसके बाद 1980 से 1990 के बीच आडवाणी ने भाजपा को एक राष्ट्रीय स्तर की पार्टी बनाने के लिए अपना पूरा समय दिया और इसका परिणाम तब सामने आया जब 1984 में महज 2 सीटें हासिल करने वाली पार्टी को 1989 के लोकसभा चुनावों में 86 सीटें मिली, जो उस समय के लिहाज से काफी बेहतर प्रदर्शन था।
पार्टी की स्थिति 1992 में 121 सीटों और 1996 में 161 सीटों पर पहुंच गई। आजादी के बाद पहली बार कांग्रेस सत्ता से बाहर थी और भाजपा सबसे अधिक संख्या वाली पार्टी बनकर उभरी थी। आडवाणी ने उस समय कहा, "प्रकृति हमारे सामने खुशहाली और उनके मायने सामने लाकर रख देती है ताकि हम खुद उनमें से चुन सकें लेकिन मुझे भारी मात्रा में दोनों प्राप्त हुए हैं।"
आडवाणी को अपने दौर का बेहद बुद्धिजीवी, काबिल और मजबूत नेता माना जाता रहा है, जिनके भीतर मजबूत और संपन्न भारत का विचार जड़ तक समाहित था। जैसा कि अटलजी बताया करते थे, आडवाणी ने कभी राष्ट्रवाद के मूलभूत विचार को नहीं त्यागा और इसे ध्यान में रखते हुए राजनीतिक जीवन में वह आगे बढ़े और जहां जरूरत महसूस हुई, वहां उन्होंने लचीलापन भी दिखाया।
आडवाणी संगठनकर्ता तक सीमित नहीं रहे, वे देश के उच्च स्तर पर पहुंचे और राष्ट्र सेवा की। वे आंतरिक सुरक्षा और आतंकवाद के खिलाफ सख्त नीति और प्रशासनिक दृढ़ता के लिए जाने गए। संसद में उनके भाषण तथ्य परक, तार्किक और राष्ट्रहित से प्रेरित रहे। लोकतंत्र, संविधान और संसदीय परंपराओं के प्रति उनका सम्मान हर दल के लिए अनुकरणीय रहा।
बतौर सांसद तीन दशक की लंबी पारी खेलने के बाद आडवाणी पहले गृह मंत्री रहे और बाद में अटल बिहारी वाजपेयी की कैबिनट में (1999-2004) उप प्रधानमंत्री बने।
2009 के चुनावों में आडवाणी नेता प्रतिपक्ष थे, इसलिए यह माना जा रहा था कि वह आगामी चुनावों में भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार होंगे। उनके पक्ष में सबसे बड़ी बात यह थी कि आडवाणी भाजपा के सबसे ताकतवर नेता रहे और उनके अलावा सिर्फ वाजपेयी इतने शीर्ष पर मौजूद रहे लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी खुद भी आडवाणी के पक्ष में थे।
10 दिसंबर 2007 को भाजपा के संसदीय बोर्ड ने यह औपचारिक ऐलान किया कि 2009 के आम चुनावों के लिए लालकृष्ण आडवाणी ही प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार होंगे लेकिन जब कांग्रेस और उसके गठबंधन के लोग चुनाव जीत गए और मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री पद पर दोबारा काबिज हो गए तो आडवाणी ने 15वीं लोकसभा में सुषमा स्वराज को नेता प्रतिपक्ष बनाया। हालांकि, 1980 में भारतीय जनता पार्टी के गठन के बाद से ही आडवाणी वह शख्स हैं जो सबसे ज्यादा समय तक पार्टी में अध्यक्ष पद पर बने रहे।
छह दशकों से अधिक की उनकी राजनीतिक यात्रा न सिर्फ भारतीय राजनीति के विकास को समझने के लिए महत्वपूर्ण है बल्कि ये बताती है कि सिद्धांत, संगठनात्मक क्षमता और वैचारिक स्पष्टता लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के प्रति उनका समर्पण कैसे किसी नेता को युग पुरुष बनाते हैं। उनके योगदान को देश ने भी सराहा और 2015 में आडवाणी को पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। 9 साल के बाद 2024 में उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारत रत्न' से सम्मानित किया गया।
--आईएएनएस
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