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जयंती विशेष : टेक्सटाइल इंजीनियर की नौकरी से एक्टिंग का सफर, देविका बनना इतना आसान नहीं

मुंबई, 29 मार्च (आईएएनएस)। “मैं बनके चिड़िया…” यह गीत आज भी सुनते ही 1930 के दशक की यादें ताजा हो जाती हैं। फिल्म 'अछूत कन्या' में अशोक कुमार के साथ जिस अभिनेत्री ने दर्शकों का दिल जीता, वह थीं देविका रानी। भारतीय सिनेमा की पहली लेडी सुपरस्टार के रूप में जानी जाने वाली देविका रानी ने उस दौर में बॉलीवुड में महिलाओं के लिए नया रास्ता दिखाया। टेक्सटाइल इंजीनियर की नौकरी छोड़कर उन्होंने फिल्मी दुनिया में कदम रखा और जल्द ही स्टार बन गईं।
 
जयंती विशेष : टेक्सटाइल इंजीनियर की नौकरी से एक्टिंग का सफर, देविका बनना इतना आसान नहीं

मुंबई, 29 मार्च (आईएएनएस)। “मैं बनके चिड़िया…” यह गीत आज भी सुनते ही 1930 के दशक की यादें ताजा हो जाती हैं। फिल्म 'अछूत कन्या' में अशोक कुमार के साथ जिस अभिनेत्री ने दर्शकों का दिल जीता, वह थीं देविका रानी। भारतीय सिनेमा की पहली लेडी सुपरस्टार के रूप में जानी जाने वाली देविका रानी ने उस दौर में बॉलीवुड में महिलाओं के लिए नया रास्ता दिखाया। टेक्सटाइल इंजीनियर की नौकरी छोड़कर उन्होंने फिल्मी दुनिया में कदम रखा और जल्द ही स्टार बन गईं।

उनकी कहानी बेहद रोचक है। उन्होंने टेक्सटाइल इंजीनियर की नौकरी छोड़कर फिल्मी दुनिया में कदम रखा था। उनकी शुरुआत एक अभिनेत्री के रूप में नहीं, बल्कि कॉस्ट्यूम डिजाइनर के रूप में हुई थी।

देविका रानी चौधरी का जन्म 30 मार्च 1908 को मद्रास प्रेसिडेंसी के छोटे से शहर वाल्टियर में हुआ था। उनके पिता कर्नल मनमथ नाथ चौधरी मद्रास प्रेसिडेंसी के सर्जन जनरल थे। मात्र 9 वर्ष की उम्र में उन्हें इंग्लैंड भेज दिया गया। वहां स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने रॉयल अकादमी ऑफ ड्रामेटिक आर्ट और रॉयल अकादमी ऑफ म्यूजिक में अभिनय व संगीत की पढ़ाई की। इसके अलावा उन्होंने आर्किटेक्चर, टेक्सटाइल और डेकोर डिजाइन में डिग्री हासिल की और टेक्सटाइल इंजीनियर के रूप में काम करने लगीं।

साल 1928 में उनकी किस्मत ने अभिनय में करियर बनाने की ओर इशारा किया और उनकी मुलाकात हिमांशु राय से हुई, जो फिल्म निर्माण की तैयारी कर रहे थे। हिमांशु राय उनकी प्रतिभा से प्रभावित हुए और उन्हें अपनी फिल्म ‘अ थ्रो ऑफ डाइस’ में काम करने का निमंत्रण दिया। देविका रानी ने अपनी नौकरी छोड़ दी और हिमांशु राय की प्रोडक्शन टीम में शामिल हो गईं। लेकिन वह अभिनेत्री के तौर पर नहीं बल्कि सहायक कॉस्ट्यूम डिजाइनर और सहायक आर्ट डायरेक्टर के रूप में जुड़ीं।

फिल्म निर्माण की नई तकनीकें सीखने के लिए दोनों जर्मनी गए। वहां देविका रानी ने बर्लिन के यूनिवर्स फिल्म एजी स्टूडियो में फिल्म निर्माण का कोर्स किया और साथ ही एक्टिंग का विशेष प्रशिक्षण भी लिया।

‘अ थ्रो ऑफ डाइस’ फिल्म के निर्माण के साथ-साथ दोनों की लव स्टोरी भी बढ़ रही थी। लिहाजा, देविका रानी और हिमांशु राय ने शादी कर ली। 1933 में भारत लौटकर हिमांशु राय ने फिल्म ‘कर्म’ बनाई, जिसमें देविका रानी को लीड एक्ट्रेस की भूमिका मिली। यह उनकी अभिनय यात्रा की शुरुआत थी। इसके बाद दोनों ने मिलकर बॉम्बे टॉकीज स्टूडियो की स्थापना की। बॉम्बे टॉकीज की पहली फिल्म ‘जवानी की हवा’ रही। अगली फिल्म ‘जीवन नैया’ में देविका रानी के साथ एक्टर के रूप में अशोक कुमार का प्रवेश हुआ।

साल 1936 में आई फिल्म ‘अछूत कन्या’ ने बॉम्बे टॉकीज को नई ऊंचाई दी। इस फिल्म ने सामाजिक असमानता पर सशक्त संदेश दिया और बेहद लोकप्रिय हुई। इसके बाद ‘जीवन प्रभात’, ‘इज्जत’, ‘प्रेम कहानी’, ‘सावित्री’, ‘निर्मला’ और ‘वचन’ जैसी फिल्में आईं। 1943 में ‘किस्मत’ फिल्म ने जबरदस्त सफलता हासिल की। देविका रानी आखिरी बार पर्दे पर 1943 में आई फिल्म ‘हमारी बात’ में नजर आईं। 1944 में ‘ज्वार भाटा’ फिल्म बॉम्बे टॉकीज की आखिरी फिल्म साबित हुई, जिससे दिलीप कुमार की शुरुआत हुई।

हिमांशु राय के निधन के बाद स्टूडियो में आंतरिक कलह बढ़ गया। लिहाजा देविका रानी फिल्मी दुनिया से दूर हो गईं। उन्होंने रूसी चित्रकार स्वेतोस्लाव रोरिच से दूसरा विवाह किया और मनाली व बेंगलुरु में रहने लगीं। देविका रानी को 1958 में पद्मश्री, 1970 में देश का सर्वोच्च फिल्म सम्मान दादासाहेब फाल्के पुरस्कार और 1990 में सोवियतलैंड नेहरू अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। 9 मार्च 1994 को उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया।

--आईएएनएस

एमटी/एबीएम