बिहार: मेहनत और जीविका के सहयोग से नवादा की ममता ने रचा आत्मनिर्भरता का नया अध्याय, बनी लखपति दीदी
नवादा, 8 अक्टूबर (आईएएनएस)। बिहार के नवादा जिले के सदर प्रखंड अंतर्गत जमुआवां पटवां सराय पंचायत के गोपालगंज गांव की रहने वाली ममता देवी ने अपनी मेहनत, हुनर और जीविका स्वयं सहायता समूह के सहयोग से साधारण गृहिणी से सफल उद्यमी और ‘लखपति दीदी’ बनने तक का सफर तय किया है।
कभी परिवार के सीमित साधनों के बीच सिलाई का काम करने वाली ममता देवी आज फ्लैक्स और डिजिटल प्रिंटिंग का कारोबार संचालित कर हर महीने करीब एक से डेढ़ लाख रुपए तक की आय अर्जित कर रही हैं। ममता देवी के परिवार की आर्थिक स्थिति सामान्य थी। परिवार के पास खेती के लिए अपनी जमीन नहीं थी। पति बिहार शरीफ में लोहे की वेल्डिंग की दुकान चलाते थे, जबकि ममता देवी घर पर सिलाई मशीन चलाकर महिलाओं और बच्चों के कपड़े सिलती थीं। इससे होने वाली आमदनी से तीन बेटों समेत पूरे परिवार का खर्च चलाना आसान नहीं था।
आर्थिक स्थिति सुधारने और अपनी आय बढ़ाने के उद्देश्य से ममता देवी 4 अप्रैल 2020 को विश्वकर्मा जीविका स्वयं सहायता समूह से जुड़ीं। वह समूह की नियमित साप्ताहिक बैठकों में शामिल होने लगीं और हर सप्ताह 10 रुपए की बचत करने लगीं। समूह से जुड़ने के बाद उन्हें न केवल बचत और ऋण की सुविधा मिली, बल्कि अपने लिए एक नया व्यवसाय शुरू करने का भरोसा भी मिला। वर्ष 2021 में ममता देवी ने जीविका स्वयं सहायता समूह से ऋण लेकर नवादा से करीब छह किलोमीटर पूर्व कादिरगंज में किराये पर दुकान ली और फ्लैक्स प्रिंटिंग मशीन स्थापित की। यह स्थान कौआकोल, पकरीबरावां, वारिसलीगंज और जमुई की ओर जाने वाली मुख्य सड़क के किनारे स्थित है।
उन्होंने अपने बेटे के साथ मिलकर फ्लैक्स प्रिंटिंग के साथ डिजिटल, ऑफसेट और स्क्रीन प्रिंटिंग का काम शुरू किया। व्यवसाय के विस्तार के दौरान जब भी पूंजी की जरूरत पड़ी, जीविका समूह ने उनका साथ दिया। वर्ष 2022 में शादी-विवाह के सीजन में शादी कार्ड की सामग्री खरीदने के लिए पूंजी की कमी हुई तो उन्होंने समूह से 25 हजार रुपये का ऋण लिया।
इसके अलावा कारोबार में कार्यशील पूंजी की जरूरत पूरी करने के लिए जीविका समूह के माध्यम से बिहार ग्रामीण बैंक से एक लाख रुपये का व्यक्तिगत ऋण भी लिया। इससे ग्राहकों के बड़े ऑर्डर और भुगतान में देरी के बावजूद कारोबार जारी रखने में मदद मिली। ममता देवी के कारोबार में उनके तीनों बेटे भी सहयोग कर रहे हैं। मंझले बेटे ने आईटीआई और कंप्यूटर में डिप्लोमा किया है और वह कंप्यूटर पर बैनर व पोस्टर डिजाइन तैयार करता है।
बड़ा बेटा व्यवसाय के संचालन में सहयोग करता है, जबकि छोटा बेटा मोबाइल रिपेयरिंग के साथ जरूरत पड़ने पर प्रिंटिंग प्रेस में भी हाथ बंटाता है। इसके अलावा दो लोगों को नियमित रूप से प्रिंटिंग से जुड़े कार्यों के लिए रोजगार मिला हुआ है। अधिक काम के समय फरवरी से अप्रैल के बीच दो-तीन लोगों को दैनिक आधार पर भी काम मिलता है।
ममता देवी की प्रिंटिंग प्रेस में फ्लैक्स, शादी कार्ड, कैलेंडर, डायरी और बिल-बुक की छपाई के साथ लाइट बोर्ड, स्ट्रेंडी और प्रचार वाहनों का निर्माण भी किया जाता है। फरवरी से अप्रैल के दौरान निजी स्कूलों की प्रचार सामग्री, शादी के मौसम में कार्ड और पर्व-त्योहारों के दौरान बैनर के बड़े ऑर्डर मिलते हैं। पिछले पांच वर्षों में ममता देवी ने अपने बेटों के सहयोग से कारोबार का लगातार विस्तार किया है।
अब उनकी मासिक आय करीब एक से डेढ़ लाख रुपए तक पहुंच गई है, जबकि वार्षिक आय 10 से 12 लाख रुपए के आसपास हो गई है। वह समूह और बैंक से लिए गए ऋण की नियमित रूप से अदायगी भी कर रही हैं।
ममता देवी का कहना है कि जरूरत के समय जीविका से वित्तीय सहायता मिलने से कारोबार को आगे बढ़ाने में काफी मदद मिली। उनका मानना है कि जीविका स्वयं सहायता समूह के सहयोग और प्रोत्साहन के बिना फ्लैक्स प्रिंटिंग का कारोबार स्थापित करना और उसे इस स्तर तक पहुंचाना संभव नहीं होता। उनका सफर ग्रामीण महिलाओं के आत्मनिर्भर बनने और उद्यमिता की दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरक मिसाल बन गया है।
--आईएएनएस
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