भाव-सम्राट पंडित शंभू महाराज : अभिनय और भाव से सजाया लखनऊ घराना, कथक को दी नई पहचान
नई दिल्ली, 3 नवंबर (आईएएनएस)। भारतीय शास्त्रीय नृत्य शैली कथक के लखनऊ घराने के महान गुरु, 'नृत्य सम्राट' पंडित शंभू महाराज की 4 नवंबर को पुण्यतिथि है। इसी दिन 1970 में उन्होंने अंतिम सांस ली थी, लेकिन उनके द्वारा स्थापित भाव-प्रधान कथक की परंपरा आज भी जीवंत है। पंडित जी को कथक में अभिनय और भाव के सबसे बड़े उस्ताद के रूप में याद किया जाता है।
पंडित शंभू महाराज का जन्म लखनऊ में शंभूनाथ मिश्रा के रूप में हुआ था। तिथि को लेकर दो मत हैं, लेकिन अधिकांश प्रमाणिक स्रोतों में 16 नवंबर 1907 माना जाता है। वे कथक के आदिगुरु ठाकुर प्रसाद के वंशज थे। उनके पिता कालका प्रसाद महाराज अवध के नवाब वाजिद अली शाह के दरबार के प्रमुख नर्तक थे। कहा जाता है कि आज हम जिस परिष्कृत कथक को जानते हैं, उसका श्रेय नवाब वाजिद अली शाह के संरक्षण और ठाकुर प्रसाद-कालका प्रसाद जैसे गुरुओं की साधना को जाता है।
शंभू महाराज को नृत्य विरासत में मिला। उनके चाचा बिंदादीन महाराज कथक में ठुमरी भाव के जनक माने जाते हैं, तो बड़े भाई अच्छन महाराज लय और तैयारी के लिए विख्यात थे। दूसरे बड़े भाई लच्छू महाराज भी प्रसिद्ध नर्तक थे। शंभू ने प्रारंभिक शिक्षा चाचा बिंदादीन से ली और फिर अच्छन महाराज से तालीम पाई। नृत्य के साथ-साथ उन्होंने हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की भी गहरी शिक्षा ली। उस्ताद रहीमुद्दीन खान से उन्होंने ठुमरी गायिकी सीखी, इसीलिए वे नृत्य के साथ-साथ गाकर भाव बताने में अद्वितीय थे।
शंभू महाराज की सबसे बड़ी विशेषता थी, उनका अभिनय। वे मंच पर केवल पैरों से टुकड़े-परन नहीं करते थे, बल्कि आंखों, भौंहों और चेहरे की सूक्ष्म भाव-भंगिमा से एक पूरी कहानी कह देते थे। ठुमरी गाते हुए उसके एक-एक बोल को अलग-अलग भाव से दिखाना उनकी कला का शिखर था। दर्शक उनके भाव में ऐसे खो जाते थे कि उन्हें घुंघरू की आवाज भी भूल जाती थी। इसी भाव-प्रधानता के कारण उन्हें 'अभिनय सम्राट' भी कहा गया।
1952 में संगीत जगत में बड़ा मोड़ आया, जब उन्होंने दिल्ली के भारतीय कला केंद्र, जो बाद में कथक केंद्र बना, में नृत्य विभाग के प्रमुख का पदभार संभाला। लखनऊ की ड्योढ़ी से निकलकर दिल्ली आने के बाद उन्होंने कथक को राष्ट्रीय मंच दिया। उनके शिष्यों की सूची ही उनकी महानता का प्रमाण है।
उनके भतीजे पंडित बिरजू महाराज, जिन्होंने कथक को विश्वव्यापी बनाया, उनके ही शिष्य थे। इसके अलावा कुमुदिनी लखिया, दमयंती जोशी, माया राव, भारती गुप्ता, उमा शर्मा, विभा दधीच, रीना सिंघा जैसे दिग्गजों ने उनसे शिक्षा ली। उनके दो पुत्र कृष्णमोहन और राममोहन और पुत्री रमेश्वरी थीं, जिनमें राममोहन ने उनकी शैली को आगे बढ़ाया।
उनके योगदान को देश ने सम्मान दिया। भारत सरकार ने 1958 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया और 1967 में उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार और संगीत नाटक अकादमी की सर्वोच्च फेलोशिप भी मिली।
जीवन के अंतिम दिनों में वे गले के कैंसर से पीड़ित रहे। नई दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में तीन महीने तक इलाज चला और 4 नवंबर 1970 को इस महान कलाकार ने दुनिया को अलविदा कह दिया।
आज जब कथक मंचों पर तेज लयकारी और चक्करदार परनों का बोलबाला है, तब शंभू महाराज की वह भाव-परंपरा हमें याद दिलाती है कि कथक केवल तकनीक नहीं, हृदय की भाषा भी है। लखनऊ घराने की नजाकत, नफासत और अदा को उन्होंने जिस तरह सहेजा, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए एक पाठशाला है।
--आईएएनएस
एससीएच/वीसी
