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भारतीय सिनेमा के सम्राट : 13 भाषाएं, 150 से ज्यादा फिल्में और गिनीज रिकॉर्ड

नई दिल्ली, 5 जून (आईएएनएस)। भारतीय सिनेमा के इतिहास में कई बड़े निर्माता हुए हैं, लेकिन कुछ नाम ऐसे हैं जो अपने काम की वजह से एक अलग पहचान रखते हैं। ऐसा ही एक नाम था दग्गुबाती रामानायडू, जिन्हें लोग डी. रामानायडू के नाम से भी जानते हैं। उन्होंने सिर्फ फिल्में नहीं बनाईं, बल्कि भारतीय सिनेमा को एक नई दिशा दी।
 
भारतीय सिनेमा के सम्राट : 13 भाषाएं, 150 से ज्यादा फिल्में और गिनीज रिकॉर्ड

नई दिल्ली, 5 जून (आईएएनएस)। भारतीय सिनेमा के इतिहास में कई बड़े निर्माता हुए हैं, लेकिन कुछ नाम ऐसे हैं जो अपने काम की वजह से एक अलग पहचान रखते हैं। ऐसा ही एक नाम था दग्गुबाती रामानायडू, जिन्हें लोग डी. रामानायडू के नाम से भी जानते हैं। उन्होंने सिर्फ फिल्में नहीं बनाईं, बल्कि भारतीय सिनेमा को एक नई दिशा दी।

आज जब किसी फिल्म को अलग-अलग भाषाओं में रिलीज करना होता है, तो उसे डब कर दिया जाता है। लेकिन डी. रामानायडू का तरीका बिल्कुल अलग था। वह हर भाषा के दर्शकों के लिए अलग फिल्म बनाते थे। स्थानीय कलाकारों, तकनीशियनों और निर्देशकों के साथ काम करते थे ताकि फिल्म उस क्षेत्र की संस्कृति और भावनाओं के करीब रहे। शायद यही कारण था कि उनकी फिल्मों को देशभर में पसंद किया गया। दिलचस्प बात यह है कि उन्हें उन सभी भाषाओं का ज्ञान भी नहीं था, जिनमें उन्होंने फिल्में बनाईं।

डी. रामानायडू का जन्म 6 जून 1936 को आंध्र प्रदेश के एक साधारण किसान परिवार में हुआ था। उनके माता-पिता खेती-बाड़ी करते थे। गांव के स्कूल से शुरुआती पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने चेन्नई के प्रेजिडेंसी कॉलेज से ग्रेजुएशन किया। हालांकि, पढ़ाई के दौरान ही उनकी रुचि थिएटर और अभिनय की दुनिया में बढ़ने लगी थी। पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने परिवार के चावल मिल व्यवसाय और ट्रांसपोर्ट के काम में हाथ बंटाया, लेकिन उनका मन वहां नहीं लगा।

इसी दौरान उनके जीवन में एक बड़ा मोड़ आया। गांव के पास एक प्रोडक्शन कंपनी शुरू हुई, जिसमें उन्होंने अपने पिता को निवेश करने के लिए राजी कर लिया। कंपनी से जुड़ने के बाद वह फिल्म सेट पर होने वाले हर छोटे-बड़े काम को देखने लगे। यहीं से उनकी सिनेमा यात्रा की शुरुआत हुई।

1958 में उनके पिता ने 'नम्मिना बंटू' नाम की फिल्म बनाई। इस फिल्म में उस दौर के बड़े अभिनेता अक्किनेनी नागेश्वर राव मुख्य भूमिका में थे। फिल्म से जुड़े लोगों ने रामानायडू को मद्रास जाकर फिल्म इंडस्ट्री में किस्मत आजमाने की सलाह दी। उन्होंने चावल मिल का काम छोड़ दिया और मद्रास पहुंच गए। शुरुआती दिनों में उन्होंने ईंट बनाने और रियल एस्टेट जैसे कई काम किए, लेकिन उनका सपना सिनेमा ही था।

साल 1963 में दोस्तों के साथ मिलकर उन्होंने 'अनुरागम' नाम की फिल्म बनाई। यह फिल्म सफल रही और यहीं से उनकी असली पहचान बननी शुरू हुई। इसके बाद उन्होंने अपने प्रसिद्ध बैनर सुरेश प्रोडक्शंस की स्थापना की, जो आगे चलकर भारतीय सिनेमा के सबसे बड़े प्रोडक्शन हाउसों में शामिल हुआ।

1971 में आई उनकी फिल्म 'प्रेम नगर' ने जबरदस्त सफलता हासिल की। फिल्म इतनी लोकप्रिय हुई कि बाद में इसे हिंदी और तमिल में भी बनाया गया। इसके बाद रामानायडू ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। उन्होंने लगातार सफल फिल्में बनाईं और अपनी पहुंच तेलुगु सिनेमा से बाहर अन्य भाषाओं तक बढ़ानी शुरू कर दी।

1983 में उन्होंने हैदराबाद में एक आधुनिक फिल्म स्टूडियो की स्थापना की। उस समय अधिकांश स्टूडियो मद्रास में हुआ करते थे, लेकिन रामानायडू चाहते थे कि तेलुगु फिल्म इंडस्ट्री की अपनी मजबूत पहचान बने। उनका यह सपना बाद में सच साबित हुआ और हैदराबाद भारतीय फिल्म निर्माण का एक बड़ा केंद्र बन गया।

धीरे-धीरे उन्होंने तेलुगु, तमिल, हिंदी, कन्नड़, मलयालम, मराठी, बंगाली, उड़िया, गुजराती, भोजपुरी, असमिया और पंजाबी समेत कुल 13 भाषाओं में 150 से अधिक फिल्में बनाईं। यह उपलब्धि इतनी बड़ी थी कि उनका नाम गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में दर्ज किया गया।

हिंदी सिनेमा में भी उनका योगदान कम नहीं रहा। उन्होंने 'तोहफा', 'दिलदार', 'हम आपके दिल में रहते हैं', 'आगाज' और 'अनाड़ी' जैसी कई लोकप्रिय फिल्मों का निर्माण किया। उन्होंने श्रीदेवी, अनिल कपूर, काजोल, करिश्मा कपूर और सुनील शेट्टी जैसे कई बड़े सितारों के साथ काम किया।

उनके योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें पद्म भूषण और भारतीय सिनेमा के सर्वोच्च सम्मान दादासाहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया। इसके अलावा उन्हें दो राष्ट्रीय पुरस्कार और कई राज्य स्तरीय फिल्म पुरस्कार भी मिले।

उन्होंने अपने करियर में 11 अभिनेत्रियों, 4 अभिनेताओं, 23 निर्देशकों और 4 संगीत निर्देशकों को फिल्म इंडस्ट्री में लॉन्च किया। 18 फरवरी 2015 को प्रोस्टेट कैंसर के कारण 78 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया। लेकिन आज भी उनका नाम भारतीय सिनेमा के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है।

--आईएएनएस

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