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भारत की वैश्विक शक्ति बनने की दिशा में ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट अहम, फिर भी कुछ लोगों में खलबली : केके सिन्हा

नई दिल्ली, 30 अप्रैल (आईएएनएस)। मेजर जनरल (रिटायर्ड) केके सिन्हा ने 'ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट' की आलोचना करने के लिए राहुल गांधी और कांग्रेस पर जुबानी हमला किया। उन्होंने कहा कि इस तरह की आपत्तियां देश के दीर्घकालिक सामरिक और आर्थिक हितों के खिलाफ हैं।
 
भारत की वैश्विक शक्ति बनने की दिशा में ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट अहम, फिर भी कुछ लोगों में खलबली : केके सिन्हा

नई दिल्ली, 30 अप्रैल (आईएएनएस)। मेजर जनरल (रिटायर्ड) केके सिन्हा ने 'ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट' की आलोचना करने के लिए राहुल गांधी और कांग्रेस पर जुबानी हमला किया। उन्होंने कहा कि इस तरह की आपत्तियां देश के दीर्घकालिक सामरिक और आर्थिक हितों के खिलाफ हैं।

उन्होंने कहा, "ग्रेट निकोबार परियोजना को लेकर देश के भीतर हलचल देखी जा रही है। कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो नहीं चाहते कि भारत वैश्विक स्तर पर तेजी से उभरकर एक मजबूत शक्ति के रूप में सामने आए। खासकर जब हम अपने प्रतिद्वंद्वी देश, जैसे चीन-पाकिस्तान की बात करते हैं, तो यह मुद्दा और अधिक संवेदनशील हो जाता है। इसके साथ ही, यह मामला व्यापक 'ग्रेट पावर गेम' से भी जुड़ा हुआ है। एक दृष्टिकोण यह है कि आने वाले 25–30 वर्षों में भारत अपनी भौगोलिक स्थिति, जनशक्ति, क्षमता, बौद्धिक संसाधनों और मजबूत होते सिस्टम के बल पर अन्य देशों को पीछे छोड़ सकता है। यही कारण है कि वैश्विक शक्ति संतुलन के इस दौर में भारत की उभरती स्थिति पर लगातार नजर रखी जा रही है। इसी परिप्रेक्ष्य में ग्रेट निकोबार परियोजना को बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यह परियोजना न केवल भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूती दे सकती है, बल्कि वैश्विक स्तर पर उसकी रणनीतिक स्थिति को भी बदलने की क्षमता रखती है। साथ ही, इससे देश की आर्थिक वृद्धि को भी बड़ा प्रोत्साहन मिलने की उम्मीद है।"

केके सिन्हा ने कहा, "अब सवाल यह है कि यह परियोजना आखिर है क्या और इसके खिलाफ आवाजें क्यों उठ रही हैं। इस पर अलग-अलग तरह की राय सामने आ रही है। कुछ लोग इसे भारत की रणनीतिक प्रगति से जोड़कर देखते हैं, जबकि कुछ पर्यावरणीय चिंताओं को लेकर सवाल उठा रहे हैं। हाल के समय में विरोध के लिए पर्यावरण को प्रमुख आधार बनाया गया है। यह मामला राष्ट्रीय हरित अधिकरण तक भी पहुंच चुका है। जिस क्षेत्र में यह विकास प्रस्तावित है, वह ग्रेट निकोबार द्वीप का हिस्सा है, जहां गलाथिया बे और इंदिरा प्वाइंट के आसपास परियोजना विकसित की जा रही है। यह स्थान अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के दक्षिणी सिरे के बेहद करीब है। गलाथिया बे की खासियत यह है कि यहां प्राकृतिक रूप से गहरा समुद्री तट (लगभग 20 से 40 मीटर) मौजूद है, जिससे बड़े कंटेनर जहाजों के लिए बिना ज्यादा कृत्रिम निर्माण के एक प्राकृतिक बंदरगाह विकसित किया जा सकता है। यही कारण है कि यहां एक अंतरराष्ट्रीय ट्रांसशिपमेंट पोर्ट, अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट और एक आधुनिक शहर विकसित करने की योजना है।"

उन्होंने कहा, "इस परियोजना का सबसे अहम पहलू इसका सामरिक महत्व है। अंडमान-निकोबार के पास 9 डिग्री और 10 डिग्री चैनल जैसे प्रमुख समुद्री मार्ग हैं, जिनसे होकर वैश्विक व्यापार का बड़ा हिस्सा गुजरता है। विशेषज्ञों के अनुसार, चीन के ऊर्जा आयात का एक बड़ा भाग भी इन्हीं मार्गों से होकर आता है। इसके अलावा मलक्का जलडमरूमध्य, सुंडा और लोम्बोक जैसे अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्ग भी इसी क्षेत्र के करीब हैं। इसी वजह से यह परियोजना केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामरिक और वैश्विक दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। हालांकि, इसके पर्यावरणीय प्रभावों और विकास के तरीके को लेकर बहस जारी है, जो इस परियोजना को चर्चा के केंद्र में बनाए हुए है।"

सिन्हा ने आगे कहा, "यह स्थान करीब 90 नॉटिकल मील की दूरी पर स्थित है और रणनीतिक दृष्टि से बेहद अहम है। विशेषज्ञों का कहना है कि भारत ने अब तक इसे अपनी सामरिक नीति (डॉक्ट्रिन) में पूरी तरह शामिल नहीं किया था, जबकि इसकी क्षमता काफी बड़ी है। यदि इस क्षेत्र का प्रभावी उपयोग किया जाए, तो वैश्विक समुद्री गतिविधियों, खासतौर पर ट्रांसशिपमेंट और ट्रांसपोर्टेशन कॉरिडोर के लगभग 40 प्रतिशत हिस्से को प्रभावित करने की क्षमता विकसित की जा सकती है।''

उन्होंने कहा, ''दुनिया में कई महत्वपूर्ण 'चोक पॉइंट्स' हैं, जैसे होर्मुज जलडमरूमध्य, मलक्का जलडमरूमध्य, स्वेज नहर और बाब-अल-मंदेब। इन स्थानों पर नियंत्रण या प्रभाव वैश्विक व्यापार और रणनीति के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। इसी तरह अंडमान-निकोबार क्षेत्र भी एक बड़ा लेकिन अपेक्षाकृत कम चर्चित सामरिक चोक पॉइंट है। इसके अलावा, जब हम कोलंबो और सिंगापुर जैसे बड़े ट्रांसशिपमेंट पोर्ट्स की बात करते हैं, तो यह समझना जरूरी है कि छोटे देश भी इन पोर्ट्स के जरिए वैश्विक व्यापार में बड़ी भूमिका निभा रहे हैं। उदाहरण के तौर पर श्रीलंका का हंबनटोटा पोर्ट, जहां चीन की भागीदारी बढ़ी है, जो क्षेत्रीय रणनीतिक प्रतिस्पर्धा को दर्शाती है। ऐसे में बंगाल की खाड़ी, अरब सागर और व्यापक हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की मजबूत उपस्थिति उसे आने वाले दो-तीन दशकों में वैश्विक शक्ति संतुलन में शीर्ष स्थान तक पहुंचा सकती है। यदि ग्रेट निकोबार में अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसपोर्टेशन पोर्ट विकसित होता है, तो कोलंबो और सिंगापुर जैसे हब्स की तुलना में दूरी और समय दोनों में कमी आएगी, जो भारत के लिए बड़ा सामरिक और आर्थिक लाभ साबित हो सकता है।

सिन्हा ने कहा, "जब 'ग्रेट निकोबार परियोजना को लेकर पर्यावरणीय नुकसान की बात की जाती है, तो कई बार यह तर्क सामने आता है कि भारत ने विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाने का प्रयास किया है। यदि यह परियोजना पूरी तरह विकसित हो जाती है, तो इससे हिंद महासागर क्षेत्र में भारत का रणनीतिक दबदबा और अधिक मजबूत हो सकता है। इसके साथ ही, भविष्य में नॉर्थ-साउथ कॉरिडोर और आर्कटिक जैसे नए व्यापारिक मार्गों का विकास भी हो रहा है, लेकिन इसके बावजूद हिंद महासागर क्षेत्र का महत्व कम नहीं होगा। भारत के पास इस क्षेत्र में प्राकृतिक भौगोलिक बढ़त है, जिसे वह रणनीतिक, आर्थिक और सामरिक दृष्टि से उपयोग कर सकता है। यदि यह परियोजना आगे बढ़ती है, तो इसे कई देशों के मौजूदा बंदरगाहों और व्यापारिक ढांचों के लिए प्रतिस्पर्धी माना जा सकता है। इसी कारण कुछ रणनीतिक हलकों में इसे 'थ्रेटनिंग डेवलपमेंट' के रूप में भी देखा जाता है। यदि यह पूरी तरह विकसित हो जाता है, तो यह दुनिया के सबसे बड़े बंदरगाहों में से एक बन सकता है, जिससे भारत की राजस्व क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि होगी और उसकी सामरिक शक्ति तथा आर्थिक ताकत दोनों में बड़ा इजाफा होगा।''

--आईएएनएस

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