बांके बिहारी मंदिर प्रबंधन विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई, 21 घंटे दर्शन व्यवस्था पर विचार करने का निर्देश
नई दिल्ली, 26 मई (आईएएनएस)। मथुरा स्थित प्रसिद्ध बांके बिहारी मंदिर के प्रबंधन और धार्मिक व्यवस्थाओं को लेकर दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई हुई। इस दौरान सुप्रीम कोर्ट ने मंदिर का प्रबंधन देख रही कमेटी से कहा कि मंदिर की पारंपरिक धार्मिक व्यवस्थाओं को बहाल करने, भीड़ प्रबंधन को बेहतर बनाने और रोजमर्रा की व्यवस्थाओं में सुधार के लिए गोस्वामियों के सुझावों पर गंभीरता से विचार किया जाए।
इस मामले में वकील अश्विनी उपाध्याय ने आईएएनएस से कहा कि मंदिर के सेवायतों, सेवादारों और गोस्वामियों का आरोप है कि प्रबंधन कमेटी धार्मिक गतिविधियों में हस्तक्षेप कर रही है। हालांकि कमेटी की ओर से सुप्रीम कोर्ट में कहा गया कि वह किसी भी धार्मिक परंपरा में दखल नहीं दे रही है और सभी धार्मिक गतिविधियां पहले की तरह ही चल रही हैं। कमेटी ने यह भी कहा कि दर्शन का समय पहले से बढ़ाया गया है।
अश्विनी उपाध्याय ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी कि जब बांके बिहारी मंदिर बना था, तब भारत की आबादी करीब 18 करोड़ थी, जिसमें आज के पाकिस्तान और बांग्लादेश का क्षेत्र भी शामिल था, लेकिन अब भारत की जनसंख्या लगभग 145 करोड़ हो चुकी है और करोड़ों श्रद्धालु मंदिर में दर्शन के लिए आते हैं। उन्होंने कहा कि मौजूदा दर्शन व्यवस्था में मजदूरों, किसानों और गरीब श्रद्धालुओं को पर्याप्त समय नहीं मिल पाता।
उन्होंने सुझाव दिया कि जिस तरह तिरुपति बालाजी मंदिर और वैष्णो देवी मंदिर में प्रतिदिन लगभग 21 घंटे दर्शन की व्यवस्था रहती है, उसी मॉडल को अपनाते हुए बांके बिहारी मंदिर में भी 21 घंटे दर्शन की व्यवस्था की जानी चाहिए। उन्होंने बांके बिहारी मंदिर को 'उत्तर भारत का तिरुपति' बताते हुए कहा कि यहां दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं, लेकिन दर्शन का समय कम होने के कारण भक्तों को भगवान के दर्शन के लिए कुछ सेकंड ही मिल पाते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने इस सुझाव पर कहा कि मंदिर प्रबंधन कमेटी इस पर विचार करेगी। कोर्ट ने राज्य सरकार को भी निर्देश दिया कि वह मंदिर और आसपास के क्षेत्र के लिए एक व्यापक योजना तैयार करे। इस योजना में अस्पताल की व्यवस्था, श्रद्धालुओं के ठहरने की सुविधा, सड़कों को चौड़ा करने और बुजुर्गों के आने-जाने की बेहतर व्यवस्था जैसे मुद्दों को शामिल किया जाए।
वहीं अधिवक्ता तन्वी उपाध्याय ने बताया कि यह मामला पिछले वर्ष अगस्त में दायर किया गया था, जब मंदिर प्रबंधन से जुड़े अध्यादेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी। उन्होंने कहा कि उस समय सुप्रीम कोर्ट ने अध्यादेश के अलावा एक कमेटी के गठन का आदेश दिया था।
तन्वी उपाध्याय ने कोर्ट में मांग रखी कि मंदिर के आंतरिक धार्मिक रीति-रिवाजों और परंपराओं में किसी तरह का हस्तक्षेप न किया जाए। उन्होंने यह भी कहा कि कमेटी के सदस्यों का चयन केवल कुछ आवेदनों के आधार पर किया गया, जबकि गोस्वामियों के दोनों प्रमुख समूहों (शयन भोग और राजभोग) के बीच विस्तृत चुनाव प्रक्रिया कराई गई थी।
उन्होंने कहा कि गोस्वामियों द्वारा चुनाव के जरिए चुने गए प्रतिनिधियों को कमेटी में शामिल किया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे पर विस्तृत सुनवाई करते हुए कहा कि गोस्वामियों के प्रतिनिधियों को उचित प्रतिनिधित्व दिया जाए और मंदिर की आंतरिक धार्मिक परंपराओं को प्रभावित नहीं किया जाए।
--आईएएनएस
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