बच्चों में तेजी से बढ़ रहा मोटापा, डब्ल्यूएचओ ने जारी की पहली ग्लोबल गाइडलाइन
नई दिल्ली, 8 अक्टूबर (आईएएनएस)। आज के समय में मोटापा सिर्फ बड़ों की समस्या नहीं रह गया है। बच्चों और किशोरों में भी बढ़ता वजन चिंता का विषय बनता जा रहा है। बदलती जीवनशैली, शारीरिक गतिविधियों की कमी और खानपान की आदतों में बदलाव के बीच बचपन में मोटापे के मामले तेजी से बढ़े हैं। इसी बढ़ती समस्या को देखते हुए विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने बच्चों और किशोरों में मोटापे की देखभाल और इलाज को लेकर पहली वैश्विक गाइडलाइन जारी की है।
डब्ल्यूएचओ के मुताबिक साल 2024 में दुनियाभर में 5 से 19 साल की उम्र के करीब 17 करोड़ बच्चे और किशोर मोटापे के साथ जी रहे थे। इनमें 5 से 9 साल की उम्र के करीब 7 करोड़ बच्चे और 10 से 19 साल के करीब 10 करोड़ किशोर शामिल थे। चिंता की बात यह है कि इस आयु वर्ग में मोटापे की दर 1990 के बाद से चार गुना बढ़ गई है। उस समय यह दर करीब 2 फीसदी थी जो 2024 में बढ़कर 8 फीसदी हो गई।
डब्ल्यूएचओ का कहना है कि मोटापा एक ऐसी बीमारी है, जो लंबे समय तक बनी रह सकती है और दोबारा भी हो सकती है। इसका असर सिर्फ बच्चे के वजन तक सीमित नहीं रहता। बचपन में मोटापा आगे चलकर टाइप-2 डायबिटीज और हृदय संबंधी बीमारियों समेत कई गैर-संचारी रोगों का खतरा बढ़ा सकता है। इसके अलावा मोटापे से जूझ रहे बच्चों को स्कूल या समाज में मजाक, भेदभाव और बुलिंग का सामना भी करना पड़ सकता है, जिसका असर उनके आत्मविश्वास और मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ सकता है।
नई गाइडलाइन में डब्ल्यूएचओ ने बच्चों और किशोरों के इलाज में केवल वजन कम करने पर ध्यान देने के बजाय उनकी पूरी सेहत और जीवनशैली को बेहतर बनाने पर जोर दिया है। संगठन ने मोटापे से जूझ रहे बच्चों और किशोरों के लिए व्यवस्थित डाइट, नियमित शारीरिक गतिविधि और व्यवहार में सकारात्मक बदलाव से जुड़े उपायों की सलाह दी है।
डब्ल्यूएचओ ने यह भी स्पष्ट किया है कि छोटे बच्चों के मामले में दवाओं या सर्जरी को सामान्य इलाज के तौर पर नहीं अपनाना चाहिए। 0 से 9 साल के बच्चों के लिए मोटापे के इलाज में दवाओं, बैरियाट्रिक सर्जरी और वजन घटाने वाले उपकरणों की सिफारिश नहीं की गई है। 10 से 19 साल के किशोरों में भी दवाओं पर तभी विचार किया जा सकता है, जब विशेषज्ञों की निगरानी में चलाया गया लाइफस्टाइल कार्यक्रम अपेक्षित परिणाम न दे।
गाइडलाइन में मानसिक स्वास्थ्य को भी नजरअंदाज न करने की बात कही गई है। चिंता, अवसाद, कम आत्मसम्मान और भावनात्मक परेशानियां बच्चों की खान-पान और शारीरिक गतिविधियों की आदतों को प्रभावित कर सकती हैं। इसलिए मोटापे के साथ-साथ बच्चे के मानसिक स्वास्थ्य पर भी समय रहते ध्यान देना जरूरी है।
--आईएएनएस
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