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बाबा महाकाल का भांग और भस्म से अलौकिक शृंगार, दर्शन कर गदगद हुए श्रद्धालु

उज्जैन, 5 जनवरी (आईएएनएस)। मध्य प्रदेश के उज्जैन में विश्व प्रसिद्ध श्री महाकालेश्वर मंदिर में माघ मास कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि पर सोमवार सुबह भस्म आरती के दौरान श्रद्धालुओं का बड़ी संख्या में आगमन हुआ। देर रात से लाइन लगाए भक्तों ने बाबा महाकाल के दर्शन किए। ब्रह्म मुहूर्त में बाबा का भांग और भस्म से विशेष शृंगार किया गया।
 
बाबा महाकाल का भांग और भस्म से अलौकिक शृंगार, दर्शन कर गदगद हुए श्रद्धालु

उज्जैन, 5 जनवरी (आईएएनएस)। मध्य प्रदेश के उज्जैन में विश्व प्रसिद्ध श्री महाकालेश्वर मंदिर में माघ मास कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि पर सोमवार सुबह भस्म आरती के दौरान श्रद्धालुओं का बड़ी संख्या में आगमन हुआ। देर रात से लाइन लगाए भक्तों ने बाबा महाकाल के दर्शन किए। ब्रह्म मुहूर्त में बाबा का भांग और भस्म से विशेष शृंगार किया गया।

महाकाल के मस्तक पर चंद्रमा और कमल लगाकर सजाया गया। यह दृश्य देखकर श्रद्धालु गदगद हो गए और मंदिर परिसर 'जय श्री महाकाल' के जयकारों से गूंज उठा। हजारों भक्त देर रात से ही लाइन में लगकर बाबा महाकाल के दर्शन के लिए पहुंचे। सुबह करीब 4 बजे बाबा महाकाल का विशेष शृंगार किया गया।

मान्यता है कि भस्म शिव का प्रिय अलंकार है, जो जीवन-मृत्यु के चक्र और निराकार स्वरूप का प्रतीक है। इस आरती में भाग लेने से भक्तों को संकटों से मुक्ति, सुख-समृद्धि और मोक्ष की प्राप्ति होती है। दुनिया भर से श्रद्धालु भस्म आरती और बाबा के दर्शन के लिए उज्जैन आते हैं। भस्म आरती की यह परंपरा सदियों से चली आ रही है, हर दिन यहां हजारों भक्त शामिल होते हैं।

महाकालेश्वर मंदिर की भस्म आरती दुनिया में अपनी तरह की इकलौती आरती है, जो ब्रह्म मुहूर्त में सुबह करीब 4 बजे होती है। इस दौरान भगवान शिव का शृंगार और आरती भस्म की जाती है, जो पौराणिक और आध्यात्मिक महत्व रखता है। भस्म श्मशान से लाई गई ताजी चिता की राख से तैयार की जाती है। इसमें गोहरी, पीपल, पलाश, शमी और बेल की लकड़ियों की राख भी मिलाई जाती है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस समय महाकाल निराकार स्वरूप में होते हैं, इसलिए महिलाएं सिर पर घूंघट या ओढ़नी डालकर रहती हैं। परंपरागत रूप से महिलाओं को गर्भगृह में प्रवेश की अनुमति नहीं होती, लेकिन वे बाहर से या विशेष व्यवस्था के अंतर्गत दर्शन कर सकती हैं।

भस्म आरती में शंखनाद, ढोल-नगाड़ों और मंत्रोच्चार के बीच भस्म चढ़ाई जाती है। इसके बाद पंचामृत अभिषेक और अन्य अलंकारों से बाबा को सजाया जाता है।

--आईएएनएस

एमटी/एएस