अपनी संस्कृति और स्मृतियों की रक्षा करने वाला राष्ट्र कभी पराजित नहीं होता: अमित शाह
मुंबई, 13 सितंबर (आईएएनएस)। गृह मंत्री अमित शाह मुंबई दौरे के दौरान एशियाटिक सोसायटी में आयोजित गणेश ज्ञानार्थी प्रदर्शनी के उद्घाटन समारोह में शामिल हुए। समारोह में आए लोगों को संबोधित करते हुए अमित शाह ने कहा, "मैं पहला गृह मंत्री हूं जो एशियाटिक सोसायटी में आया है, लेकिन मैं यहां गृह मंत्री के नाते नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान परंपरा को सहस्रों वर्षों तक आगे ले जाने के आंदोलन के एक आंदोलनकारी के रूप में आया हूं। मुझे पूर्ण विश्वास है कि एशियाटिक सोसायटी मुंबई भारतीय ज्ञान परंपरा की वाहक बनकर इसे देशभर में पहुंचाने का कार्य करेगी।"
उन्होंने कहा, "जो राष्ट्र अपनी भाषा, संस्कृति, स्मृति, इतिहास, संस्कार, अभिलेख और पंरपराओं की रक्षा नहीं कर सकता है, वह कितना भी शक्तिशाली हो, उसको समाप्त होने में देर नहीं लगती है। जो राष्ट्र अपनी भाषा, संस्कृति, स्मृति, इतिहास, संस्कार, भाषा, परंपराएं और व्यकारण की रक्षा करता है, वह चाहे जितने साल भी गुलाम रहे, उसको गुलाम नहीं बना सकता है, इसका भारत उदाहरण है। अनेक लोगों ने पूरे विश्व का मार्दर्शन देने वाले यहां पैदा हुए ओजस्वी ज्ञान को समाप्त करने का प्रयास किया, लेकिन नहीं कर पाए। नालंदा का पुस्तकालय जला सकते हैं, लेकिन स्मृति और श्रुति से जो लोगों के चित में बसा है, उस ज्ञान को कोई समाप्त नहीं कर सकता।"
गृह मंत्री ने कहा, "हमारे देश का संस्कार है कि जब हम पराजित होते हैं, तब धैर्य रखकर आगे बढ़ते हैं। जब विजयी होते हैं, तो जिन पर विजय प्राप्त करते हैं, उनकी स्मृतियों को नष्ट किए बिना हमारे परंपरा में जोड़ने का प्रयास करते हैं।"
अमित शाह ने एशियाटिक सोसायटी में परिवर्तन लाने पर जोर देते हुए कहा, "सच्चा ज्ञान, कभी किसी विचारधारा का बंधक नहीं होता। ज्ञान अपने आप में एक विचारधारा है और इसको किसी प्रकार से बांधते हो तो ज्ञान के मायने बदल जाते हैं। ज्ञान मुक्त और उन्मुक्त होना चाहिए। इसलिए एशियाटिक सोसायटी में जो ज्ञान, संपदा और एकत्रिकरण का उपयोग महान भारत की रचना में करना चाहिए। एशियाटिक सोसायटी के ज्ञान का इस्तेमाल अब विश्व के कल्याण के लिए होगा। अंग्रेजों ने ज्ञान और सत्ता को एक सूत्र में बांध दिया था, लेकिन अब ज्ञान और सत्ता को अलग कर ज्ञान के आधार पर सत्ता की रचना हो और देश चले, ऐसी व्यवस्था बनाने का काम एशियाटिक सोसायटी को करना चाहिए।"
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा, "आज मैं यहां बहुत कम समय के लिए बोलने आया हूं, लेकिन मैं 'इंडोलॉजी' शब्द के बारे में जरूर बात करना चाहता हूं। एशियाटिक सोसायटी को समझने के लिए 'इंडोलॉजी' शब्द को समझना भी जरूरी है। न्यूमिजमैटिक्स (सिक्का-विज्ञान), एपिग्राफी (अभिलेख-शास्त्र), एंथ्रोपोलॉजी (मानव-विज्ञान), इतिहास, पुरातत्व, भाषा-विज्ञान, दर्शनशास्त्र, साहित्य, धर्मशास्त्र और व्याकरण - इन सबको मिलाकर 'इंडोलॉजी' बनी। हालांकि, मैं आज यह साफ करना चाहता हूं कि उस समय इसका मकसद दुनिया या ब्रह्मांड का कल्याण करना नहीं था, जो भारतीय ज्ञान परंपरा में ज्ञान का मकसद होता है। इसका मकसद यहां की व्यवस्थाओं को समझना और लंबे समय तक लोगों पर राज करना था।"
गृह मंत्री ने कहा, "भारत का संस्कार है कि जब हम पराजित होते हैं, तो धैर्य रखकर आगे बढ़ते हैं और जब विजय प्राप्त करते हैं, तो जिन पर विजय पाई है, उनकी स्मृति को नष्ट किए बिना उन्हें अपनी परंपरा से जोड़ने का प्रयास करते हैं। एशियाटिक सोसायटी में बदलाव की बात करते हुए मैं कहना चाहता हूं कि सच्चे ज्ञान को कभी बांधा नहीं जा सकता। एशियाटिक सोसायटी के ज्ञान का भारत के विकास में किस तरह योगदान हो सकता है, इस पर काम करना चाहिए।"
अमित शाह ने कहा, "एशियाटिक सोसायटी के ज्ञान के संपूर्ण का विस्तार तीन दृष्टियों से होना चाहिए। ज्ञान का विस्तार करने वाले विद्वानों को यहां लाना चाहिए, इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से देशभर के पुस्तकालयों को आपस में जोड़ना चाहिए और महाराष्ट्र के गांव-गांव में मौजूद पांडुलिपियों को सहेजकर उनके शोध व ज्ञान को भारतम पांडुलिपि के माध्यम से सामने लाने में योगदान देना चाहिए।"
--आईएएनएस
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