अनुभव से मिलने वाली शिक्षा कठिन होती है, फिर भी जीवनभर साथ रहती है : मोहन भागवत
नई दिल्ली, 24 जुलाई (आईएएनएस)। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने मातृत्व, भारतीय संस्कृति और समाज में बदलते मूल्यों पर अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि मातृत्व केवल परिवार तक सीमित विषय नहीं है, बल्कि सृष्टि के निर्माण, विकास और पालन-पोषण का मूल आधार है। भागवत ने यह भी कहा कि समय के साथ सीखना और परिस्थितियों के अनुरूप स्वयं को ढालना भी जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
मोहन भागवत ने कहा, "मातृत्व जैसे विषय पर पुरुषों का बोलना अपने आप में एक विरोधाभास है, क्योंकि यह मूल रूप से महिलाओं के अनुभव और अधिकार से जुड़ा विषय है। इस विषय पर पहले भी कई मंचों पर विस्तार से चर्चा हो चुकी है, लेकिन मातृत्व के महत्व को बार-बार समझना और स्वीकार करना आवश्यक है।"
उन्होंने कहा, "मातृत्व के बिना सृष्टि की रचना, उसका विकास और पालन पोषण संभव नहीं है। प्रकृति ने सभी जीवों को जीवन दिया है, लेकिन मनुष्य को सोचने और विचार करने की विशेष क्षमता प्रदान की है। यही विचार-शक्ति मनुष्य को अन्य प्रजातियों से अलग बनाती है और उसे चुनौतियों का समाधान खोजने में सक्षम बनाती है। इसी क्षमता के कारण मनुष्य आज समाज और सभ्यता के विकास का नेतृत्व कर रहा है।"
मोहन भागवत ने भारतीय इतिहास और सांस्कृतिक परंपराओं का उल्लेख करते हुए कहा, "समय के साथ देश को अनेक विदेशी आक्रमणों का सामना करना पड़ा। इन परिस्थितियों में समाज को अपनी सुरक्षा के लिए कई ऐसे बदलाव अपनाने पड़े, जो मूल भारतीय परंपराओं का हिस्सा नहीं थे। कुछ परिवर्तन परिस्थितियों की मजबूरी में हुए, जबकि कुछ बाहरी प्रभावों के कारण समाज में आए। इतिहास की इन घटनाओं को समझते हुए अपनी मूल सांस्कृतिक सोच और मूल्यों को संरक्षित रखना आवश्यक है।"
उन्होंने कहा, "समय के साथ बदलना भी मातृत्व का एक महत्वपूर्ण पहलू है। जीवन में परिवर्तन स्वाभाविक प्रक्रिया है और मनुष्य अपने अनुभवों से लगातार सीखता रहता है। सीखने के कई माध्यम होते हैं। यदि मार्गदर्शन उपलब्ध हो तो व्यक्ति सहज रूप से आगे बढ़ता है, लेकिन कई बार अनुभव ही सबसे बड़ा शिक्षक बनता है। हालांकि अनुभव से मिलने वाली शिक्षा कठिन होती है, फिर भी वह जीवनभर साथ रहती है।"
भागवत ने कहा, "मां का स्नेह और भावनात्मक सहयोग केवल बचपन तक सीमित नहीं होता। जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता है, वह कई बार मां की बातों का विरोध भी करता है, लेकिन इसके बावजूद मां का रिश्ता सबसे अलग और स्थायी रहता है। जीवन के हर चरण में व्यक्ति को भावनात्मक सहारे की आवश्यकता होती है और मां वह स्थान होती है, जहां व्यक्ति बिना किसी संकोच के अपनी भावनाएं व्यक्त कर सकता है।"
उन्होंने कहा, "जीवन में एक समय ऐसा आता है जब औपचारिक शिक्षा की आवश्यकता कम हो जाती है, लेकिन भावनात्मक मार्गदर्शन और अपनापन हमेशा जरूरी रहता है। मां का स्नेह व्यक्ति को मानसिक शांति, आत्मविश्वास और कठिन परिस्थितियों से उबरने की शक्ति देता है।"
अपने संबोधन के अंत में मोहन भागवत ने कहा कि समाज को मातृत्व के महत्व को केवल पारिवारिक भूमिका तक सीमित नहीं रखना चाहिए, बल्कि इसे मानवीय मूल्यों, संवेदनशीलता और सामाजिक संतुलन के आधार के रूप में देखना चाहिए। उनके अनुसार, परिवार और समाज दोनों की मजबूती में मातृत्व की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है।
--आईएएनएस
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