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अंतरराष्ट्रीय तिब्बत मुक्ति दिवस: तिब्बत की आजादी, निर्वासन और पहचान की अधूरी कहानी

नई दिल्ली, 22 मई (आईएएनएस)। पूरी दुनिया के लिए 23 मई कैलेंडर में दर्ज महज एक तारीख हो सकती है, लेकिन तिब्बती समुदाय के लिए यह स्मृति, पीड़ा, प्रतिरोध और पहचान का दिन है। तिब्बत के लोग इस दिन को 'अंतरराष्ट्रीय तिब्बत मुक्ति दिवस' के रूप में याद करते हैं। एक ऐसा दिन, जो उन्हें अपनी खोई हुई स्वायत्तता, बिखरे हुए घरों और निर्वासन के दर्द की याद दिलाता है।
 
अंतरराष्ट्रीय तिब्बत मुक्ति दिवस: तिब्बत की आजादी, निर्वासन और पहचान की अधूरी कहानी

नई दिल्ली, 22 मई (आईएएनएस)। पूरी दुनिया के लिए 23 मई कैलेंडर में दर्ज महज एक तारीख हो सकती है, लेकिन तिब्बती समुदाय के लिए यह स्मृति, पीड़ा, प्रतिरोध और पहचान का दिन है। तिब्बत के लोग इस दिन को 'अंतरराष्ट्रीय तिब्बत मुक्ति दिवस' के रूप में याद करते हैं। एक ऐसा दिन, जो उन्हें अपनी खोई हुई स्वायत्तता, बिखरे हुए घरों और निर्वासन के दर्द की याद दिलाता है।

एक तरफ चीन 23 मई 1951 को तिब्बत की शांतिपूर्ण मुक्ति का प्रतीक बताता है। वहीं तिब्बती समुदाय इसे अपनी स्वतंत्रता के अंत और जबरन कब्जे की शुरुआत मानता है। यही कारण है कि दुनियाभर में फैले तिब्बती शरणार्थी इस दिन को काला दिवस के रूप में मनाते हैं। तिब्बत और चीन के बीच विवाद की जड़ इतिहास में बहुत पीछे तक जाती है। चीन का दावा है कि तिब्बत 13वीं शताब्दी से उसका हिस्सा रहा है, इसलिए उस पर उसका अधिकार है। दूसरी ओर तिब्बत इस दावे को कभी स्वीकार नहीं करता।

साल 1912 में तिब्बत के 13वें धर्मगुरु दलाई लामा ने तिब्बत को स्वतंत्र राष्ट्र घोषित कर दिया था। उस समय चीन ने खुलकर विरोध नहीं किया, लेकिन समय के साथ हालात बदलते गए। साल 1950 में चीन में कम्युनिस्ट शासन स्थापित होने के बाद उसकी विस्तारवादी नीति तेज हुई। हजारों चीनी सैनिक तिब्बत की ओर बढ़ने लगे। तनाव की स्थिति बनी। जो करीब आठ महीने तक चली, इस दौरान सैन्य दबाव भी रहा। आखिरकार 23 मई 1951 को तिब्बत के प्रतिनिधियों और चीन के बीच तथाकथित 17 सूत्रीय समझौते पर हस्ताक्षर हुए।

इस समझौते में तिब्बत की संस्कृति, धर्म और दलाई लामा की स्थिति में हस्तक्षेप न करने का वादा किया गया था लेकिन तिब्बती समुदाय का आरोप है कि यह समझौता स्वतंत्र इच्छा से नहीं, बल्कि दबाव और सैन्य भय के बीच कराया गया था। यहीं से तिब्बत की स्वायत्तता धीरे-धीरे खत्म होने लगी और आधिकारिक तौर पर वह चीन के नियंत्रण में चला गया।

समझौते के बाद भी हालात सामान्य नहीं हुए। तिब्बतियों के भीतर चीन के प्रति असंतोष लगातार बढ़ता गया। तिब्बती संस्कृति, धार्मिक स्वतंत्रता और राजनीतिक अधिकारों को लेकर नाराजगी गहराती रही। साल 1955 में चीन के खिलाफ व्यापक विरोध प्रदर्शन शुरू हुए। इसे तिब्बत का पहला बड़ा विद्रोह माना जाता है। प्रदर्शन हिंसक होते गए और हजारों लोगों की जान चली गई। तिब्बतियों के लिए यह सिर्फ राजनीतिक संघर्ष नहीं था, उनके लिए यह उनकी पहचान, धर्म और संस्कृति को बचाने की लड़ाई बन चुका था।

मार्च 1959 में हालात और खराब हो गए। खबर फैली कि चीन दलाई लामा को बंधक बना सकता है। इसके बाद हजारों लोग दलाई लामा के महल के बाहर जमा हो गए। स्थिति गंभीर होते देख दलाई लामा ने सैनिक का वेश धारण किया और वहां से निकल गए। कठिन रास्तों से होते हुए वे भारत पहुंचे, जहां भारत सरकार ने उन्हें शरण दी। इसके बाद से वह भारत में रह रहे हैं।

निर्वासन में रहते हुए भी तिब्बती समुदाय ने अपनी लोकतांत्रिक व्यवस्था को जीवित रखा। दुनियाभर में फैले तिब्बती शरणार्थी निर्वासित सरकार के चुनाव में हिस्सा लेते हैं।

तिब्बत का प्रश्न केवल एक क्षेत्रीय विवाद नहीं रहा, बल्कि उसने भारत-चीन संबंधों को भी गहराई से प्रभावित किया। माना जाता है कि भारत द्वारा दलाई लामा को शरण देना चीन को स्वीकार नहीं था और यही तनाव आगे चलकर 1962 के भारत-चीन युद्ध के कारणों में शामिल हुआ। बाद में साल 2003 में भारत ने औपचारिक रूप से तिब्बत को चीन का हिस्सा माना। इसके जवाब में चीन ने सिक्किम को भारत का हिस्सा मानने की बात कही, हालांकि समय के साथ चीन के रुख में फिर बदलाव दिखाई देने लगा।

हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला की पहाड़ियों से लेकर दुनिया के अलग-अलग देशों में बसे तिब्बती शरणार्थी आज भी अपनी भाषा, संस्कृति और परंपराओं को जीवित रखने की कोशिश कर रहे हैं।

--आईएएनएस

पीआईएम/वीसी