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अमेरिका-ईरान सीजफायर में 'मध्यस्थ' पाकिस्तान, अफगानिस्तान मामले में चीन को क्यों कर रहा आगे?

नई दिल्ली, 9 अप्रैल (आईएएनएस)। अमेरिका-ईरान के बीच एक महीने से ज्यादा समय तक जारी रहे संघर्ष के बाद दोनों पक्षों के बीच सीजफायर हुआ। इसकी मध्यस्थता पाकिस्तान ने की। अमेरिका-ईरान के बीच 10-पॉइंट सीजफायर पर सहमति बनी। इन सबके बीच चौंकाने वाली बात यह है कि पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच भी लंबे समय से विवाद चल रहा है। हाल ही में दोनों तरफ से झड़पें तेज हो गई। हालांकि, अफगानिस्तान के साथ सुलह करने के लिए पाकिस्तान, चीन को मध्यस्थता करने के लिए आगे कर रहा है।
 
अमेरिका-ईरान सीजफायर में 'मध्यस्थ' पाकिस्तान, अफगानिस्तान मामले में चीन को क्यों कर रहा आगे?

नई दिल्ली, 9 अप्रैल (आईएएनएस)। अमेरिका-ईरान के बीच एक महीने से ज्यादा समय तक जारी रहे संघर्ष के बाद दोनों पक्षों के बीच सीजफायर हुआ। इसकी मध्यस्थता पाकिस्तान ने की। अमेरिका-ईरान के बीच 10-पॉइंट सीजफायर पर सहमति बनी। इन सबके बीच चौंकाने वाली बात यह है कि पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच भी लंबे समय से विवाद चल रहा है। हाल ही में दोनों तरफ से झड़पें तेज हो गई। हालांकि, अफगानिस्तान के साथ सुलह करने के लिए पाकिस्तान, चीन को मध्यस्थता करने के लिए आगे कर रहा है।

दरअसल, पाकिस्तान शक्ति और कमजोर घरेलू आर्थिक हालातों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है। एक उच्च स्तर की कूटनीतिक चाल के तहत पाकिस्तान विश्व पटल पर अपनी छवि सुधारने की कोशिश में लगा हुआ है, ताकि उसे चीन से आर्थिक मदद मिल सके, जिससे वो महंगाई से जूझ रही अपनी जनता की मदद कर सके।

पाकिस्तान और ईरान के बीच गैस पाइपलाइन प्रोजेक्ट काफी लंबे समय से रुका हुआ है। ऐसे में इस मध्यस्थता के तहत पाकिस्तान ईरान के साथ बातचीत के जरिए उस प्रोजेक्ट को फिर से रफ्तार देने की योजना बना रहा है। अमेरिकी प्रतिबंधों की वजह से तेल लेना मुश्किल है। अगर पाकिस्तान अमेरिका के साथ बातचीत सही कर लेता है और उसे छूट मिल जाती है, तो वह ईरान से सस्ते में तेल खरीद सकेगा।

दूसरी तरफ अमेरिका के गुडबुक्स में आकर पाकिस्तान को कर्ज मिलना आसान हो जाएगा। अमेरिका के साथ संबंध सही करके पाकिस्तान के लिए अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष और वर्ल्ड बैंक से वित्तीय मदद मिलने में आसानी होगी।

अगर पाकिस्तान और अफगानिस्तान की बात करें, तो दोनों देशों के बीच संबंध इतने तनावपूर्ण हैं कि यहां इस्लामाबाद सीधे तौर पर खुद से बात करके चीजें सही नहीं कर सकता है।

दोनों देशों के बीच भरोसे की हद से ज्यादा कमी है। चीन पाकिस्तान में बहुत बड़े स्तर पर निवेश कर रहा है। इसके अलावा, चीन का सीपीईसी (चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा) प्रोजेक्ट अफगानिस्तान तक बढ़ाने की योजना है। चीन के पास पैसा है, जो अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण के लिए जरूरी है। पाकिस्तान जानता है कि चीन के निवेश के बिना अफगानिस्तान को शांत नहीं रखा जा सकता।

इसके अलावा, पाकिस्तान चीन को अपने रक्षा कवच की तरह इस्तेमाल करना चाहता है। यह भी एक बड़ा कारण है कि अफगानिस्तान के मामले में पाकिस्तान चीन को आगे कर रहा है। वहीं, चीन से पाकिस्तान बड़े निवेश की उम्मीद भी करता है।

मौजूदा समय में पाकिस्तान के पास विदेशी मुद्रा भंडार (रिजर्व) में 21 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक की राशि है। विदेशी मुद्रा भंडार की राशि से पाकिस्तान फिलहाल यूएई को कर्ज चुका सकता है, लेकिन आने वाले महीनों में देश को बाहरी वित्तीय मदद की आवश्यकता पड़ सकती है।

हालांकि, पाकिस्तान दुनिया के अन्य देशों के सामने हाथ फैलाकर ही अपनी गाड़ी को आगे खींच रहा है। 31 मार्च 2026 तक पाकिस्तान ने आईएमएफ से लगभग 729 करोड़ डॉलर का कर्ज ले रखा है। ट्रेडिंग इकोनॉमिक्स के अनुसार, पाकिस्तान पर कुल विदेशी कर्ज दिसंबर 2025 की दूसरी तिमाही तक लगभग 138 अरब डॉलर पहुंच गया है।

आईएमएफ के अनुसार, पाकिस्तान वर्तमान में आईएमएफ के 7 अरब डॉलर के विस्तारित फंड सुविधा कार्यक्रम के तहत काम कर रहा है। मार्च 2026 के अंत में, आईएमएफ ने पाकिस्तान के लिए लगभग 1.2 अरब डॉलर की अगली किस्त जारी करने पर सहमति जताई।

चीन पाकिस्तान का सबसे बड़ा कर्जदाता है। चीन ने पाकिस्तान को लगभग 29 अरब डॉलर का कर्ज दिया है। इसके अलावा सऊदी अरब ने करीब 9.16 अरब डॉलर की वित्तीय सहायता और जमा राशि के रूप में मदद दी है। प्रोफिट बाई पाकिस्तान के आंकड़ों के अनुसार, पाकिस्तान को अप्रैल 2026 में 1.3 अरब डॉलर के यूरोबॉन्ड का भुगतान भी करना है।

--आईएएनएस

केके/एबीएम