अधिकमास द्वादशी पर बाबा महाकाल की अलौकिक भस्म आरती, मंदिर परिसर में 'हर-हर महादेव' की गूंज
उज्जैन, 28 मई (आईएएनएस)। ज्येष्ठ अधिकमास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि पर तड़के विश्व प्रसिद्ध श्री महाकालेश्वर मंदिर में बाबा की भस्म आरती में शामिल होने के लिए देश-विदेश से श्रृद्धालुओं की भारी भीड़ देखने को मिली। मंदिर परिसर में मौजूद भक्त बाबा की भक्ति में विलीन नजर आए।
बाबा महाकाल के दर्शनों की ललक में भक्तों ने बुधवार देर रात से ही कतारों में लगना शुरू कर दिया था। रातभर लाइन में खड़े रहने के बाद भी श्रद्धालुओं के उत्साह में कोई कमी नहीं दिखी। हर कोई अपने आराध्य देव की एक झलक पाने को आतुर था।
परंपरा अनुसार, भोर में भगवान वीरभद्र से आज्ञा लेकर मंदिर के पट खोले गए, जिसके बाद अपने आराध्य को देख मौजूद सभी भक्तगण उत्साहित नजर आए। वे बाबा के दर्शन पाकर 'हर-हर महादेव' और 'जय महाकाल' के जयकारे लगाने लगे।
पट खोलने के बाद बाबा का जलाभिषेक किया गया। इसके बाद भगवान का ठंडे जल और दूध, दही, घी, शहद व शक्कर के पंचामृत से अभिषेक किया गया।
गुरुवार के विशेष शृंगार में बाबा का रूप देखते ही बनता था। बाबा के मस्तक पर चंद्रमा और त्रिनेत्र सजाए गए। साथ ही, महाकाल को भांग, चंदन, सूखे मेवों और आभूषणों से सजाकर राजा के रूप में तैयार किया गया, जिसे देखकर भक्त भावविभोर हो उठे। इसके बाद महानिर्वाणी द्वारा बाबा को भस्म अर्पित की गई।
भस्म आरती के दौरान शंख, डमरू और घंटी की गूंज से पूरा वातावरण बेहद दिव्य और आध्यात्मिक हो गया। पूरा मंदिर परिसर घंटियों, शंखध्वनि और मंत्रोच्चार से गुंजायमान रहा। हर ओर भक्ति और आस्था का माहौल था।
बाबा महाकाल की रोजाना की जाने वाली भस्म आरती सृष्टि के विनाश और पुनर्जन्म के चक्र (मृत्युलोक) के प्रतीक के रूप में की जाती है, जहां भस्म को शिव जी को अर्पित कर जीवन की क्षणभंगुरता का संदेश दिया जाता है। आरती में उपयोग होने वाली भस्म गाय के गोबर से बने कंडों को जलाकर तैयार की जाती है। पहले श्मशान की चिता की राख का उपयोग होता था, लेकिन अब प्रतीकात्मक रूप से भस्म तैयार की जाती है।
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