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'अब मैं नहीं याद करता तुम्हें...' प्रयाग शुक्ल की कविताएं बनी जिंदगी के कैनवास पर 'स्टिल लाइफ' की प्रतिनिधि

नई दिल्ली, 27 मई (आईएएनएस)। "बरस बीते मिले थे हम दूर देश में एक और देश में दूसरे, आज मैं नहीं याद करता तुम्हें जाने कहां हो तुम बरस बीते... अब मैं नहीं याद करता तुम्हें..." इस कविता के रचयिता कोई साधारण कवि नहीं, बल्कि हिंदी साहित्य, कला समीक्षा और भाषाई सेतु के एक अत्यंत गरिमामय स्तंभ प्रयाग शुक्ल हैं।
 
'अब मैं नहीं याद करता तुम्हें...' प्रयाग शुक्ल की कविताएं बनी जिंदगी के कैनवास पर 'स्टिल लाइफ' की प्रतिनिधि

नई दिल्ली, 27 मई (आईएएनएस)। "बरस बीते मिले थे हम दूर देश में एक और देश में दूसरे, आज मैं नहीं याद करता तुम्हें जाने कहां हो तुम बरस बीते... अब मैं नहीं याद करता तुम्हें..." इस कविता के रचयिता कोई साधारण कवि नहीं, बल्कि हिंदी साहित्य, कला समीक्षा और भाषाई सेतु के एक अत्यंत गरिमामय स्तंभ प्रयाग शुक्ल हैं।

प्रयाग शुक्ल का जन्म 28 मई, 1940 को कलकत्ता (अब कोलकाता) के प्रबुद्ध और महानगरीय परिवेश में हुआ।

प्रयाग शुक्ल की कविता की सबसे बड़ी शक्ति उसका 'ठहराव' है। 1960 के दशक के दौर में उन्होंने 'कविता संभव' (1976), 'यह एक दिन है' (1980), और 'यह जो हरा है' (1990) जैसी कृतियों के माध्यम से हिंदी कविता को एक अत्यंत शांत, संयत, और मानवीय गरिमा से भरा स्वर दिया।

कला-समीक्षकों ने उनकी कविताओं को चित्रकला की भाषा में 'स्टिल लाइफ' कहा है।

नौकरी, समय न था, बारिश, दरवाजा जैसी कविताओं को पढ़ते हुए ऐसा लगता है, मानो कोई सुंदर दृश्य कागज पर आकर सुस्ताने लगा हो।

हिंदी पत्रकारिता और विमर्श में ललित कलाओं की समीक्षा को एक प्रतिष्ठित और गंभीर विधा के रूप में स्थापित करने का सबसे बड़ा श्रेय प्रयाग शुक्ल को ही जाता है। मात्र 23 वर्ष की उम्र में चित्रकला की दुनिया से जुड़ने वाले प्रयाग शुक्ल का मानना है कि कलाकृतियों को देखना भी एक साधना है।

दैनिक समाचार पत्र जनसत्ता में उनका पाक्षिक स्तंभ 'सम्मुख' कला-जगत का एक जीवंत दस्तावेज बन गया। प्रयाग शुक्ल ने अनुवाद के जरिए बांग्ला के श्रेष्ठ वैचारिक चिंतन को हिंदी पाठकों के हृदय तक पहुंचाया।

उनकी सबसे बड़ी अनुवाद-सिद्धि बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के निबंधों का अनुवाद है। नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित 'बंकिमचंद्र : प्रतिनिधि निबंध' (1995) में उन्होंने बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के स्त्री-विमर्श, राष्ट्रवाद और 'प्रीति' (प्रेम) के सिद्धांतों को इतनी सहज और मौलिक हिंदी में ढाला कि वर्ष 1999 में उन्हें साहित्य अकादमी के प्रतिष्ठित 'अनुवाद पुरस्कार' से सम्मानित किया गया।

इसके अलावा, उन्होंने गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कालजयी कृति 'गीतांजलि' का सीधे मूल बांग्ला से हिंदी में अनुवाद किया। आधुनिक बांग्ला कविता के दो शिखरों (जीवनानन्द दास और शंख घोष) की कविताओं को हिंदी की तरलता दी। मैक्सिकन कवि ओक्ताविया पॉज और फिलीपींस के राष्ट्रीय लेखक होसे रिसाल के उपन्यास 'मुक्ति स्वप्न' को भारतीय पाठकों के लिए सुलभ बनाया।

एक संपादक के रूप में प्रयाग शुक्ल ने 'अज्ञेय' और रघुवीर सहाय जैसे दिग्गजों के साथ साप्ताहिक 'दिनमान' में काम किया, तो 'कल्पना' और 'नवभारत टाइम्स' को भी समृद्ध किया। रंगमंच की दुनिया में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) की प्रसिद्ध पत्रिका 'रंगप्रसंग' और संगीत नाटक अकादमी की 'संगना' के वे संस्थापक संपादक रहे, जहां उन्होंने दृश्य और मंच कलाओं की समीक्षा को एक नया बौद्धिक धरातल दिया।

साहित्य अकादमी अनुवाद पुरस्कार (1999), मध्य प्रदेश सरकार का राष्ट्रीय शरद जोशी सम्मान (2002), द्विजदेव सम्मान और श्रीनरेश मेहता वाङ्मय स्मृति सम्मान जैसी तमाम कड़ियों से अलंकृत प्रयाग शुक्ल आज भी भारतीय कला और साहित्य के परिदृश्य पर एक शांत वटवृक्ष की तरह खड़े हैं।

--आईएएनएस

वीकेयू/एबीएम