आशिमा अहलावत: 12वीं में 98.6 प्रतिशत अंक से 'एशियन गेम्स 2026' तक का सफर
नई दिल्ली, 16 सितंबर (आईएएनएस)। रोहतक की आशिमा अहलावत का एशियन गेम्स तक का सफर घर में हुई एक शर्त से शुरू हुआ था। शर्त यह थी कि पहले पढ़ाई में उम्दा प्रदर्शन करना होगा, तभी उन्हें निशानेबाजी को गंभीरता से अपनाने की आजादी मिलेगी। 18 साल की उम्र में आशिमा ने यह वादा पूरा करते हुए 12वीं बोर्ड परीक्षा में 98.6 प्रतिशत अंक हासिल किए। अब, चार साल बाद, 22 वर्षीय निशानेबाज आइची-नागोया 2026 एशियन गेम्स में डेब्यू के लिए तैयार हैं।
आशिमा अहलावत कॉमनवेल्थ गेम्स 2018 में भारत के प्रदर्शन से प्रेरित हुईं। शुरू में उन्होंने पिस्टल शूटिंग चुनी, लेकिन बाद में शॉटगन इवेंट्स की ओर रुख किया।
आशिमा अहलावत ने उस पल को याद करते हुए कहा, "उस मंच पर मनु भाकर और हीना सिद्धू को देखकर, मुझे याद है कि मैंने सोचा था - मैं भी कभी वैसा ही महसूस करना चाहती हूं।"
कंस्ट्रक्शन के काम से जुड़े एक बिजनेस परिवार से आने वालीं आशिमा अहलावत के शूटिंग करने के फैसले के लिए उनकी मां को भी काफी त्याग करना पड़ा; जिन्होंने बेटी की ट्रेनिंग में मदद करने के लिए रोहतक से दिल्ली तक का सफर तय किया।
आशिमा ने बताया, "मां ने मुझे सिर्फ इजाजत ही नहीं दी, बल्कि इसके लिए बहुत कुछ त्याग भी किया। वह रोहतक से दिल्ली आ गईं और हमारे फैमिली बिजनेस को भी वहां शिफ्ट कर लिया, ताकि मैं ठीक से ट्रेनिंग कर सकूं। मैं इस बात को हल्के में नहीं लेती।"
उनकी शुरुआती यात्रा आसान नहीं थी। अपनी पहली शॉटगन और एम्युनिशन का इंतजाम करने में उन्हें लगभग 8 महीने लग गए, लेकिन इन मुश्किलों ने उनके हौसले को कम नहीं किया। उन्होंने कहा, "सिर्फ मेडल ही यह नहीं बताता कि आप कितनी दूर आ गए हैं। अगर कुछ ठीक नहीं होता, तो मैं गलती ढूंढ़ती हूं, उसे सुधारती हूं और और मजबूती से वापसी करती हूं।"
वर्ल्ड चैंपियनशिप 2024 में आखिरी टारगेट पर हुई एक चूक की वजह से वह चौथे स्थान पर रहीं, लेकिन कुछ हफ्तों बाद ही दिल्ली में वर्ल्ड यूनिवर्सिटी चैंपियनशिप में ब्रॉन्ज मेडल जीतकर और अपना पर्सनल बेस्ट स्कोर बनाकर शानदार वापसी की।
अहलावत अपनी तरक्की का श्रेय नेशनल राइफल एसोसिएशन ऑफ इंडिया (एनआरएआई) को देती हैं, खासकर इसलिए क्योंकि उन्होंने कैंप, कॉम्पिटिशन और एम्युनिशन तक बेहतर पहुंच बनाने में मदद की है।
उन्होंने कहा, "एनआरएआई ने मुझ जैसे शूटर्स के लिए चीजें बहुत आसान बना दी हैं। कैंप, कॉम्पिटिशन और यहां तक कि एम्युनिशन की लगातार उपलब्धता जैसी बुनियादी चीजें भी। जो लोग इस खेल से जुड़े नहीं हैं, वे इसे समझ नहीं पाते, लेकिन इससे सब कुछ बदल जाता है। पिछले दो वर्षों में एनआरएआई कैंप से मुझे जो अनुभव मिला है, मुझे नहीं लगता कि उसके बिना मैं इतनी तेजी से आगे बढ़ पाती।"
शूटिंग में अपना सफर आगे बढ़ाते हुए आशिमा को एक ऐसे खेल की मानसिक चुनौतियों से निपटने के तरीके भी खोजने पड़े जहां एकाग्रता बहुत अहम होती है। वह मानती हैं कि वह बहुत ज्यादा सोचती हैं, इसलिए निशाना लगाने से पहले खुद को शांत रखने के लिए उन्होंने एक आसान रूटीन बना लिया है।
उन्होंने कहा, "मैं अपनी सांस लेने की प्रक्रिया पर ध्यान देती हूं और सच कहूं तो, शूटिंग स्टेशन पर मैं बस अपने दिमाग में कोई गाना लूप पर चलाती रहती हूं। यह उस पल में शांत और सुरक्षित महसूस करने का मेरा तरीका है।"
आइची-नागोया में अपने पहले एशियन गेम्स में हिस्सा लेने की तैयारी के साथ, अहलावत का ध्यान मेडल जीतने के बजाय अभी के काम पर है। उन्होंने कहा, "मेरी योजन एक-एक टारगेट पर ध्यान देना है। मैं हर समय मेडल के बारे में नहीं सोचना चाहती, बस अभी के पल में रहना और इस प्रक्रिया का लुत्फ उठाना चाहती हूं। मेरे लिए अगला बड़ा लक्ष्य फिर से टीम में जगह बनाना, ओलंपिक कोटा हासिल करना और ओलंपिक में अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करना है। यही वह सपना है जिसे मैं अब पूरा करने की कोशिश कर रही हूं।"
--आईएएनएस
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