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पनामा नहर और संप्रभुता की लड़ाई: 1962 से शुरू हुई कहानी अभी खत्म नहीं हुई

नई दिल्ली, 9 जनवरी (आईएएनएस)। पनामा नहर केवल एक जलमार्ग नहीं रही है, बल्कि यह पिछले एक सदी से वैश्विक शक्ति संतुलन का प्रतीक भी रही है। 10 जनवरी 1962 के आसपास पनामा सिटी में हुए दंगों ने इस नहर से जुड़े उस दौर के असमान शक्ति संबंधों को उजागर कर दिया था, जब अमेरिका का इस क्षेत्र पर लगभग पूर्ण नियंत्रण था।
 
पनामा नहर और संप्रभुता की लड़ाई: 1962 से शुरू हुई कहानी अभी खत्म नहीं हुई

नई दिल्ली, 9 जनवरी (आईएएनएस)। पनामा नहर केवल एक जलमार्ग नहीं रही है, बल्कि यह पिछले एक सदी से वैश्विक शक्ति संतुलन का प्रतीक भी रही है। 10 जनवरी 1962 के आसपास पनामा सिटी में हुए दंगों ने इस नहर से जुड़े उस दौर के असमान शक्ति संबंधों को उजागर कर दिया था, जब अमेरिका का इस क्षेत्र पर लगभग पूर्ण नियंत्रण था।

उन प्रदर्शनों के पीछे पनामा की जनता, खासकर युवाओं का यह गुस्सा था कि उनकी जमीन पर स्थित एक अत्यंत महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय मार्ग पर उनका स्वयं का अधिकार सीमित क्यों है? यही जनआक्रोश आगे चलकर अमेरिका की नीति में बदलाव और अंततः नहर के हस्तांतरण की प्रक्रिया का आधार बना।

1960 के दशक में अमेरिका पनामा नहर को अपने रणनीतिक और सैन्य हितों के लिए अनिवार्य मानता था। शीत युद्ध के माहौल में यह नहर अमेरिकी नौसेना और वैश्विक व्यापार दोनों के लिए जीवनरेखा जैसी थी। लेकिन पनामा में बढ़ते राष्ट्रवादी आंदोलनों ने यह साफ कर दिया कि औपनिवेशिक सोच के साथ लंबे समय तक किसी संवेदनशील क्षेत्र पर नियंत्रण बनाए रखना संभव नहीं है। 1962 के दंगों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह संदेश दिया कि पनामा नहर का सवाल केवल प्रशासन का नहीं, बल्कि संप्रभुता और सम्मान का है।

इसी पृष्ठभूमि में 1977 में अमेरिका और पनामा के बीच टोरीहोस–कार्टर संधि हुई, जिसने नहर के भविष्य की दिशा तय कर दी। इस संधि के तहत यह निर्णय लिया गया कि नहर का नियंत्रण चरणबद्ध तरीके से पनामा को सौंपा जाएगा। 31 दिसंबर 1999 को जब पनामा ने नहर का पूर्ण नियंत्रण संभाला, तो यह अमेरिका के प्रत्यक्ष प्रभुत्व के अंत और नई कूटनीतिक वास्तविकता की शुरुआत का संकेत था। अमेरिका ने सैन्य और प्रशासनिक नियंत्रण छोड़ा, लेकिन नहर में उसकी रुचि और प्रभाव पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ।

2026 की वर्तमान वैश्विक स्थिति में पनामा नहर फिर से चर्चा के केंद्र में है, हालांकि स्वरूप बदल चुका है। अब अमेरिका का प्रभाव सीधे नियंत्रण के बजाय रणनीतिक साझेदारी, कूटनीति और सुरक्षा हितों के माध्यम से दिखाई देता है। दूसरी ओर, चीन ने पिछले वर्षों में पनामा और मध्य अमेरिका में व्यापार, बंदरगाहों और बुनियादी ढांचे में अपनी मौजूदगी बढ़ाई है। इससे पनामा नहर एक बार फिर महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा के प्रतीक के रूप में देखी जाने लगी है।

इसके साथ ही, जलवायु परिवर्तन ने नहर की भूमिका को और जटिल बना दिया है। पानी की कमी और परिचालन चुनौतियों के कारण वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर असर पड़ा है, जिससे इस मार्ग का रणनीतिक महत्व और बढ़ गया है। अमेरिका सहित कई बड़े व्यापारिक देश अब नहर की स्थिरता और सुरक्षा को केवल क्षेत्रीय नहीं, बल्कि वैश्विक आर्थिक सुरक्षा के नजरिए से देखने लगे हैं।

इस तरह 1962 के दंगों से शुरू हुई कहानी 2026 तक आते-आते एक नए चरण में प्रवेश कर चुकी है। अमेरिका का प्रभाव अब प्रत्यक्ष शासन के रूप में नहीं, बल्कि भू-राजनीतिक हितों, वैश्विक व्यापार और शक्ति संतुलन के संदर्भ में दिखाई देता है। पनामा नहर आज भी यह साबित करती है कि इतिहास में उठी जनआवाजें समय के साथ अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को बदलने की ताकत रखती हैं, और उनका असर दशकों बाद भी विश्व राजनीति में महसूस किया जाता है।

--आईएनएनएस

केआर/