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16 साल की उम्र में घर से भागे थे अजीत वर्मन, ऑर्केस्ट्रा में ड्रम बजाकर शुरू किया संगीत का सफर

मुंबई, 25 मार्च (आईएएनएस)। बीते दौर के ऐसे कई सितारे हैं, जिनकी चमक सालों बाद भी उनके काम के रूप में बरकरार है। ऐसे ही चमकता सितारा थे संगीतकार अजीत वर्मन, जिन्होंने हिंदी सिनेमा के समानांतर और मुख्यधारा दोनों धाराओं में अपनी अलग पहचान बनाई।
 
16 साल की उम्र में घर से भागे थे अजीत वर्मन, ऑर्केस्ट्रा में ड्रम बजाकर शुरू किया संगीत का सफर

मुंबई, 25 मार्च (आईएएनएस)। बीते दौर के ऐसे कई सितारे हैं, जिनकी चमक सालों बाद भी उनके काम के रूप में बरकरार है। ऐसे ही चमकता सितारा थे संगीतकार अजीत वर्मन, जिन्होंने हिंदी सिनेमा के समानांतर और मुख्यधारा दोनों धाराओं में अपनी अलग पहचान बनाई।

अजीत वर्मन ने ‘आक्रोश’, ‘सारांश’, ‘अर्ध सत्य’ और ‘ये आशिकी मेरी’ जैसी फिल्मों के लिए यादगार संगीत दिया। वे उन गिने-चुने संगीतकारों में से एक थे, जिन्होंने शास्त्रीय, लोक और पश्चिमी संगीत को सुंदर तरीके से मिलाकर अनोखी धुनें रचीं।

अजीत वर्मन का जन्म 26 मार्च 1947 को कोलकाता में हुआ था। बचपन से ही संगीत के प्रति गहरी लगन रखने वाले अजीत मात्र 16 साल की उम्र में घर से भाग गए। कुछ साल उन्होंने बेहद कठिन परिस्थितियों में गुजारे और इसी दौरान संगीत की बारीकियां सीखीं।

वह संगीतकार और गीतकार सलिल चौधरी के घर के पास रहकर उनकी धुनें सुनते और चर्च में गाए जाने वाले गीतों को भी ध्यान से सुनते थे। उनकी लगन देखकर सलिल चौधरी ने उन्हें अपने ऑर्केस्ट्रा में शामिल कर लिया था। साल 1970 में अजीत मुंबई आए थे और सलिल चौधरी के ऑर्केस्ट्रा में शामिल हो गए। यहां उनकी मुलाकात संगीत अरेंजर सेबेस्टियन डिसूजा से हुई। सेबेस्टियन ने उन्हें शंकर-जयकिशन के मशहूर ऑर्केस्ट्रा में शामिल होने का सुझाव दिया। कहा जाता है कि जब अजीत ने पहली बार शंकर-जयकिशन के ऑर्केस्ट्रा में ड्रम बजाया, तो जयकिशन उनकी शैली से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने तुरंत उन्हें अपना ड्रमर बना लिया।

अजीत वर्मन ने ‘मेरा नाम जोकर’, ‘आनंद’ जैसी फिल्मों के लिए काम किया। वह लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के साथ भी जुड़े। साल 1976 में उन्होंने ‘नूर-ए-इलाही’ फिल्म के लिए स्वतंत्र संगीतकार के रूप में डेब्यू किया। हालांकि, 1980 में गोविंद निहलानी की ‘आक्रोश’ के साथ उन्हें असली पहचान मिली। इसके बाद उन्होंने निहलानी की ‘विजेता’ और ‘अर्ध सत्य’ के लिए भी संगीत दिया। महेश भट्ट की ‘सारांश’ में उनका संगीत आज भी याद किया जाता है।

अजीत वर्मन का संगीत समृद्ध और जटिल बनावट वाला होता था। उनका बैकग्राउंड स्कोर कहानी को गहराई प्रदान करता था। उन्होंने माधुरी पुरंदारे, सत्यशील देशपांडे और वंदना खांडेकर जैसी नई आवाजों को मौका दिया। उनकी आखिरी फिल्म ‘ये आशिकी मेरी’ (1998) रही। 2012 में ‘लाइफ इज गुड’ में उन्होंने आखिरी बार बैकग्राउंड स्कोर दिया। अजीत वर्मन ने 26 दिसंबर 2012 को दुनिया को अलविदा कह दिया।

--आईएएनएस

एमटी/डीएससी