डॉ. जयशंकर आईआईएम के दीक्षांत समारोह में हुए शामिल, कहा- भारत जैसा आशावाद दुनिया में नहीं मिलता
रायपुर, 4 अप्रैल (आईएएनए)। विदेश मंत्री डॉ. एस जयशंकर शनिवार सुबह रायपुर पहुंचे। रायपुर एयरपोर्ट पहुंचने पर विदेश मंत्री का स्वागत शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव ने किया। इस दौरान प्रशासनिक अधिकारियों और संस्थान के प्रतिनिधियों ने भी उनका अभिनंदन किया। स्वागत के बाद वे सीधे एयरपोर्ट से नवा रायपुर स्थित आईआईएम परिसर के लिए रवाना हुए।
विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर नवा रायपुर स्थित भारतीय प्रबंधन संस्थान (आईआईएम) के 15वें वार्षिक दीक्षांत समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए।
आईआईएम रायपुर के 15वें वार्षिक दीक्षांत समारोह को संबोधित करते हुए, डॉ. एस जयशंकर ने कहा, "वर्तमान में विश्व जिस उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा है, वह कई मायनों में संरचनात्मक भी है। वैश्विक व्यवस्था हमारी आंखों के सामने परिवर्तित हो रही है, जिसमें रिलेटिव पावर और वैश्विक शक्ति संतुलन में स्पष्ट बदलाव दिखाई दे रहे हैं।"
उन्होंने कहा, "इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि हाल ही में दुनिया भर में आए कई झटकों ने हमारी सहनशक्ति की परीक्षा ली है, और भारत ने उन सभी का मजबूती से सामना किया है। हमने देश के अंदर और बाहर, दोनों तरह की चुनौतियों का काफी हद तक सफलतापूर्वक सामना किया है।"
डॉ. जयशंकर ने कहा, "हमारे समाज में एक ऐसा आशावाद है जो दुनिया के कई दूसरे हिस्सों में देखने को नहीं मिलता। अब आप पूछ सकते हैं कि ऐसा क्यों है? पिछले 10 साल काफी बेहतर रहे हैं, जिससे यह भरोसा जगा है कि अगले 10 साल और उसके बाद का समय भी बेहतर ही होगा। आखिर, अब हम दुनिया की शीर्ष पांच अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हो चुके हैं।"
उन्होंने कहा कि इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि हाल ही में दुनिया भर में आए कई झटकों ने हमारी सहनशक्ति की परीक्षा ली है और भारत ने उन सभी का मजबूती से सामना किया है। हमने देश के अंदर और बाहर, दोनों तरह की चुनौतियों का काफी हद तक सफलतापूर्वक सामना किया है।
विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने कहा, "ज्यादा समावेशी विकास, प्रतिनिधि राजनीति और निर्णायक नेतृत्व ने एक नई नींव रखी है, जिस पर खड़े होकर अब हम सभी और भी ऊंची आकांक्षाएं पाल सकते हैं। हमने न सिर्फ डिजिटल क्रांति को पूरे उत्साह के साथ अपनाया है, बल्कि असल में इसे अपने जीवन में एक मकसद के साथ लागू भी किया है। यहाँ तक कि कई विकसित समाजों ने भी ऐसा नहीं किया है। शायद यह 'कर दिखाने की भावना' का भी एक जागरण है।"
--आईएएनएस
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