कोटा में प्रसूताओं की मौत मामले में बड़ा खुलासा: ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन की खेप निकली घटिया गुणवत्ता की
राजस्थान के कोटा में प्रसूताओं की मौत के मामले में जांच के दौरान बड़ा खुलासा हुआ है। औषधि नियंत्रण विभाग द्वारा जांच के लिए भेजे गए 20 दवाइयों के सैंपलों में से एक इंजेक्शन की खेप घटिया गुणवत्ता की पाई गई है। प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन की एक खेप में आवश्यक मात्रा में ऑक्सीटोसिन कम्पोनेंट नहीं मिला, जिससे गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
जानकारी के अनुसार प्रसूताओं की मौत के बाद स्वास्थ्य विभाग और औषधि नियंत्रण विभाग ने अस्पताल में उपयोग की जा रही दवाइयों की जांच शुरू की थी। इसी क्रम में 20 अलग-अलग दवाओं के सैंपल प्रयोगशाला भेजे गए थे। जांच रिपोर्ट आने के बाद पता चला कि ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन की एक खेप गुणवत्ता मानकों पर खरी नहीं उतरी।
विशेषज्ञों के मुताबिक ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन प्रसव के दौरान और बाद में महिलाओं के उपचार में बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। इसका उपयोग प्रसव पीड़ा बढ़ाने और अत्यधिक रक्तस्राव रोकने के लिए किया जाता है। ऐसे में इंजेक्शन में आवश्यक कम्पोनेंट की पर्याप्त मात्रा नहीं होना मरीजों के लिए गंभीर खतरा बन सकता है।
सूत्रों के अनुसार जांच में यह सामने आया कि संबंधित इंजेक्शन की खेप में ऑक्सीटोसिन तत्व निर्धारित मानकों से कम पाया गया। इसके बाद विभाग ने संबंधित बैच को लेकर सतर्कता बढ़ा दी है। मामले में संबंधित दवा कंपनी और सप्लाई चैन की भी जांच की जा रही है।
प्रसूताओं की मौत के मामले ने पहले ही प्रदेशभर में चिंता बढ़ा दी थी। अब घटिया गुणवत्ता वाली दवा सामने आने के बाद स्वास्थ्य व्यवस्था और दवा आपूर्ति प्रणाली पर सवाल उठने लगे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि अस्पतालों में उपयोग होने वाली दवाओं की नियमित और सख्त जांच बेहद जरूरी है, ताकि मरीजों की जान से खिलवाड़ न हो।
औषधि नियंत्रण विभाग के अधिकारियों ने बताया कि मामले की विस्तृत जांच जारी है और रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी। यदि किसी स्तर पर लापरवाही या नियमों का उल्लंघन सामने आता है तो संबंधित जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी।
वहीं स्वास्थ्य विभाग भी पूरे मामले पर नजर बनाए हुए है। अस्पतालों को संबंधित दवा के उपयोग को लेकर आवश्यक निर्देश जारी किए जा सकते हैं। इस मामले ने एक बार फिर सरकारी अस्पतालों में दवाओं की गुणवत्ता और निगरानी व्यवस्था को लेकर बहस छेड़ दी है।
फिलहाल जांच एजेंसियां यह पता लगाने में जुटी हैं कि घटिया गुणवत्ता वाली यह खेप अस्पताल तक कैसे पहुंची और इसका मरीजों पर कितना असर पड़ा।
