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Kota पत्थर की बाउंड्री बनाई , शूटर ने सेफ जगह खुद को कवर्ड किया, पानी पीकर जाते समय निशाना लगाया
 

कोटा न्यूज डेस्क, कोचिंग नगरी कोटा के नांता क्षेत्र के पुराने महल में छिपा तेंदुआ आखिरकार 7वें दिन शांत हो गया। 7 दिनों तक इलाके के लोग सहमे रहे। महल में संचालित दो सरकारी स्कूलों को भी दूसरी जगह शिफ्ट करना पड़ा। विशेषज्ञ टीम ने 15 घंटे तक निगरानी की और 7 से 8 मिनट में अलर्ट कर तेंदुए को शांत करा दिया। गुरुवार को दोपहर 1 बजे स्वास्थ्य परीक्षण के बाद जंगल में छोड़ दिया गया।
टीम सदस्य क्षेत्रीय वन अधिकारी लाडपुरा कुंदन सिंह ने बताया कि तेंदुए ने नांता महल में डेरा डाल रखा था. इस कारण यहां संचालित दो सरकारी स्कूलों को दूसरी जगह स्थानांतरित कर दिया गया। आबादी क्षेत्र में तेंदुआ बार-बार छोटे जानवरों का शिकार कर रहा था। लोग दहशत में थे। फॉरेस्ट की टीम ने महल में ट्रैप कैमरे और पिंजरे लगाए। खाने के लिए पिंजरों में सूअर और मुर्गे रखे जाते थे। उसके बावजूद तेंदुआ पकड़ में नहीं आ रहा था। लोगों का गुस्सा बढ़ता देख सवाई माधोपुर से रैपिड रिस्पांस टीम बुलाई गई। सवाई माधोपुर की टीम भी पिंजरा लेकर आई थी।

पिंजरों में खाने के लिए सूअर और मुर्गे रखे जाते थे। उसके बावजूद पैंथर पकड़ में नहीं आ रहा था। इसके पीछे कारण यह था कि महल के आसपास आबादी की बस्ती थी। कॉलोनी में छोटे जानवर और पालतू जानवर रहते हैं। इसलिए तेंदुआ आसानी से अपना शिकार बना रहा था। दो-तीन दिन से तेंदुआ छोटे जानवरों का शिकार कर रहा था। शिकार को पिंजरे में बंद करने के बाद भी तेंदुआ शिकार को खाने नहीं आयापानी की टंकी के आसपास लगे कैमरा ट्रैप में तेंदुए की हलचल पाई गई। टीम को पता था कि हर जानवर 24 घंटे में एक बार पानी पीने जरूर जाता है। वन विभाग की संयुक्त टीम ने प्लानिंग तैयार की। बुधवार सुबह 9 बजे 15 सदस्यीय टीम पैलेस पहुंची। पानी के एक कुंड के आसपास तेंदुए को शांत करने की योजना बनाई। टीम ने पानी टंकी के चारों ओर पत्थर लगाकर उसकी ऊंचाई बढ़ा दी। पानी पीने के लिए एक ही जगह बची है।


टीम के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि टीम के सदस्यों को अंदर रखकर कैसे महल को ट्रैंकुलाइज किया जाए। क्योंकि महल का क्षेत्रफल बहुत लम्बा था। वहां रहना खतरे से खाली नहीं था। जरा सी चूक होने पर तेंदुआ हमला भी कर सकता था। शूटर को ट्रैंकुलाइज करने के लिए सुरक्षित जगह पर होना जरूरी था। टीम ने दिन में ऊंचाई वाले सुरक्षित स्थान का चयन किया। जहां से तेंदुए के पीने के पानी का जाल बिछाया जा सके। उस स्थान को पूरी तरह से जाल से ढक दिया। यहां स्पेशलिस्ट डॉक्टर और शूटर तैनात किए गए थे। ताकि जैसे ही तेंदुआ पानी पीने आए तो उसे शांत करा दिया जाए।

महल के बाहर दो-दो की टोली में जवानों को तैनात कर दिया गया ताकि महल के आसपास लोग जमा न हो सकें। लोगों को शोर नहीं मचाना चाहिए। हमले और शोर के कारण तेंदुआ डर के मारे इधर-उधर भाग सकता है। जिससे लोगों को नुकसान हो सकता था। दूसरे तंबू के बाद तेंदुए को आसानी से निकालकर दूर ले जाना चाहिए। इसलिए लोगों को वहां इकट्ठा होने से रोक दिया गया।

महल का क्षेत्रफल करीब 15 से 20 बीघा है। यहां कई कमरे और हॉल हैं। टीम को अंदेशा था कि डॉट मिलने के बाद तेंदुआ इधर-उधर भाग जाएगा। अगर वह रात के अंधेरे में यहां-वहां बैठ जाए तो उसे ढूंढ़ना मुश्किल होगा। उन्हें भी समय अधिक लगेगा। इस दौरान इंजेक्शन का असर भी खत्म हो सकता है। ऐसी स्थिति से निपटने के लिए टीम ने चूल्हे की राख को कुंड के चारों ओर बिखेर दिया। ताकि उसके पगमार्क से तेंदुए का पता लगाया जा सके।

रात होते ही वन टीमों को उनके-अपने ठिकानों पर अलर्ट कर दिया गया। और तेंदुए के निकलने का इंतजार करता रहा। सूत्रों के मुताबिक तेंदुए की मूवमेंट रात करीब 10.30 बजे शुरू हुई। तेंदुआ के बाहर आते ही बंदरों ने शोर मचाना शुरू कर दिया। तेंदुआ एक बड़े पेड़ पर चढ़ गया। फिर वापस गायब हो गया।

जल बिंदु पर पहुंचने पर शांत हो गया

करीब 11:30 बजे तेंदुआ वाटर प्वाइंट पर आ गया। करीब 7 से 8 मिनट तक कुंड के आसपास रुके रहे। जैसे ही वह पानी पीकर जाने लगा। रणथंभौर रैपिड रिस्पांस यूनिट के शूटर राजवीर सिंह ने कुंड को 40-50 फीट की दूरी से गोली मारकर शांत कर दिया। बिंदी लगते ही तेंदुआ भाग गया। इंजेक्शन कुछ दूर जाकर गिरा।

पगमार्क से तेंदुआ ढूंढे

महल में मौजूद वन टीम ने तेंदुए की तलाश शुरू कर दी। तेंदुआ सीढ़ियों के सहारे महल की दूसरी मंजिल की छत पर जाकर बेहोश हो गया। टीम ने चूल्हे की राख से बने पगमार्क ट्रेस करने शुरू किए। करीब 15 से 20 मिनट में तेंदुए की तलाशी ली। रात 11 बजकर 47 मिनट पर तेंदुआ छत पर बेहोशी की हालत में पड़ा मिला। जिसके बाद टीम के सदस्यों ने उसे नीचे उतारा और पिंजरे में डालकर लाडपुरा रेंज ले गए।