नाबालिग अवस्था में किए अपराध के आधार पर सरकारी नौकरी से बर्खास्त नहीं किया जा सकता: राजस्थान हाईकोर्ट
राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर मुख्यपीठ ने एक महत्वपूर्ण और दूरगामी असर वाला फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी व्यक्ति ने नाबालिग अवस्था में कोई अपराध किया था, तो केवल उसी आधार पर उसे सरकारी नौकरी से बर्खास्त नहीं किया जा सकता। यह फैसला सरकारी सेवा में कार्यरत कर्मचारियों के अधिकारों और किशोर न्याय व्यवस्था की भावना को मजबूत करता है।
यह मामला हनुमानगढ़ जिले के एक दिव्यांग सफाई कर्मचारी से जुड़ा हुआ था। याचिकाकर्ता को सरकारी नौकरी से इस आधार पर हटा दिया गया था कि उसके खिलाफ पूर्व में आपराधिक मामला दर्ज रहा है। विभाग की ओर से यह दलील दी गई कि कर्मचारी के आपराधिक रिकॉर्ड को देखते हुए उसे सेवा में बनाए रखना उचित नहीं है। हालांकि, कर्मचारी ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर यह तर्क दिया कि जिस अपराध का हवाला देकर उसे बर्खास्त किया गया, वह उसने नाबालिग रहते हुए किया था।
मामले की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि किशोर अवस्था में किए गए अपराधों को वयस्क अपराधों की तरह नहीं देखा जा सकता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किशोर न्याय अधिनियम का मूल उद्देश्य सुधार और पुनर्वास है, न कि दंड। ऐसे में नाबालिग रहते हुए किए गए अपराध के आधार पर किसी व्यक्ति को जीवनभर दंडित करना कानून और न्याय की भावना के खिलाफ है।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में यह भी कहा कि जब कानून खुद यह मानता है कि नाबालिग अपराधी को सुधार का अवसर दिया जाना चाहिए, तो बाद में उसी आधार पर सरकारी नौकरी छीन लेना अनुचित है। कोर्ट ने विभाग की कार्रवाई को गलत ठहराते हुए कर्मचारी की बर्खास्तगी को निरस्त कर दिया।
कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि याचिकाकर्ता एक दिव्यांग व्यक्ति है और सफाई कर्मचारी के रूप में सेवा दे रहा था। ऐसे में उसके साथ की गई कार्रवाई न सिर्फ कानूनी रूप से गलत है, बल्कि सामाजिक दृष्टि से भी संवेदनहीन है। न्यायालय ने माना कि कर्मचारी ने नौकरी के दौरान किसी भी तरह का अनुशासनहीन आचरण नहीं किया और उसके कार्य निष्पादन पर भी कोई नकारात्मक टिप्पणी नहीं थी।
इस फैसले के बाद हाईकोर्ट ने संबंधित विभाग को निर्देश दिए कि याचिकाकर्ता को सेवा में पुनः बहाल किया जाए और नियमानुसार उसे सभी लाभ प्रदान किए जाएं। साथ ही कोर्ट ने यह भी साफ किया कि भविष्य में ऐसे मामलों में विभागों को किशोर न्याय कानून और संवैधानिक मूल्यों को ध्यान में रखकर निर्णय लेना चाहिए।
