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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश: 15 अप्रैल से पहले कराए जाएं पंचायत निकाय चुनाव, परिसीमन को चुनौती देने वाली याचिका खारिज

 
देशभर में पंचायत निकाय चुनावों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट निर्देश देते हुए कहा है कि पंचायत निकाय चुनाव 15 अप्रैल से पहले हर हाल में कराए जाएं। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने पंचायतों के परिसीमन और पुनर्गठन प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया है। अदालत के इस फैसले को लोकतांत्रिक व्यवस्था और स्थानीय स्वशासन के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।  सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पंचायत चुनाव समय पर कराना संविधान की अनिवार्य व्यवस्था है और इसे किसी भी स्थिति में अनावश्यक रूप से टाला नहीं जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि स्थानीय निकायों का कार्यकाल समाप्त होने के बाद चुनाव में देरी लोकतांत्रिक प्रक्रिया के खिलाफ है। इसलिए राज्य सरकारों और राज्य निर्वाचन आयोगों की जिम्मेदारी है कि वे तय समय सीमा के भीतर पंचायत चुनाव संपन्न कराएं।  पंचायत परिसीमन और पुनर्गठन प्रक्रिया को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने कहा कि परिसीमन एक प्रशासनिक प्रक्रिया है और इसमें अदालत का हस्तक्षेप तभी उचित है, जब इसमें संविधान या कानून का स्पष्ट उल्लंघन हो। कोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ता यह साबित करने में असफल रहे कि परिसीमन प्रक्रिया में किसी तरह की गंभीर कानूनी खामी या मनमानी की गई है। इसी आधार पर याचिका को खारिज कर दिया गया।  सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि परिसीमन या पुनर्गठन के नाम पर चुनाव को लंबे समय तक टालना स्वीकार्य नहीं है। अदालत ने टिप्पणी की कि पंचायत स्तर पर निर्वाचित प्रतिनिधियों की अनुपस्थिति से ग्रामीण विकास, योजनाओं के क्रियान्वयन और प्रशासनिक निर्णयों पर प्रतिकूल असर पड़ता है। इसलिए समयबद्ध चुनाव लोकतंत्र की बुनियाद को मजबूत करते हैं।  कोर्ट के इस आदेश के बाद अब राज्य सरकारों और चुनाव आयोगों पर पंचायत चुनाव की तैयारियां तेज करने का दबाव बढ़ गया है। चुनाव प्रक्रिया में आरक्षण, वार्डों का निर्धारण और मतदाता सूची जैसे कार्यों को जल्द पूरा करने के निर्देश भी अप्रत्यक्ष रूप से इस फैसले में निहित माने जा रहे हैं।

देशभर में पंचायत निकाय चुनावों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट निर्देश देते हुए कहा है कि पंचायत निकाय चुनाव 15 अप्रैल से पहले हर हाल में कराए जाएं। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने पंचायतों के परिसीमन और पुनर्गठन प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया है। अदालत के इस फैसले को लोकतांत्रिक व्यवस्था और स्थानीय स्वशासन के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पंचायत चुनाव समय पर कराना संविधान की अनिवार्य व्यवस्था है और इसे किसी भी स्थिति में अनावश्यक रूप से टाला नहीं जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि स्थानीय निकायों का कार्यकाल समाप्त होने के बाद चुनाव में देरी लोकतांत्रिक प्रक्रिया के खिलाफ है। इसलिए राज्य सरकारों और राज्य निर्वाचन आयोगों की जिम्मेदारी है कि वे तय समय सीमा के भीतर पंचायत चुनाव संपन्न कराएं।

पंचायत परिसीमन और पुनर्गठन प्रक्रिया को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने कहा कि परिसीमन एक प्रशासनिक प्रक्रिया है और इसमें अदालत का हस्तक्षेप तभी उचित है, जब इसमें संविधान या कानून का स्पष्ट उल्लंघन हो। कोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ता यह साबित करने में असफल रहे कि परिसीमन प्रक्रिया में किसी तरह की गंभीर कानूनी खामी या मनमानी की गई है। इसी आधार पर याचिका को खारिज कर दिया गया।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि परिसीमन या पुनर्गठन के नाम पर चुनाव को लंबे समय तक टालना स्वीकार्य नहीं है। अदालत ने टिप्पणी की कि पंचायत स्तर पर निर्वाचित प्रतिनिधियों की अनुपस्थिति से ग्रामीण विकास, योजनाओं के क्रियान्वयन और प्रशासनिक निर्णयों पर प्रतिकूल असर पड़ता है। इसलिए समयबद्ध चुनाव लोकतंत्र की बुनियाद को मजबूत करते हैं।

कोर्ट के इस आदेश के बाद अब राज्य सरकारों और चुनाव आयोगों पर पंचायत चुनाव की तैयारियां तेज करने का दबाव बढ़ गया है। चुनाव प्रक्रिया में आरक्षण, वार्डों का निर्धारण और मतदाता सूची जैसे कार्यों को जल्द पूरा करने के निर्देश भी अप्रत्यक्ष रूप से इस फैसले में निहित माने जा रहे हैं।