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कम बोली जाने वाली भाषाओं को बचाने की पहल, IIT जोधपुर के प्रोफेसर कर रहे विरासत की भाषाओं पर शोध

 
कम बोली जाने वाली भाषाओं को बचाने की पहल, IIT जोधपुर के प्रोफेसर कर रहे विरासत की भाषाओं पर शोध

भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं है, बल्कि यह किसी समुदाय की परंपराओं, सामाजिक जीवन, स्थानीय ज्ञान और दुनिया को देखने के नजरिए को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाने का महत्वपूर्ण साधन भी है। इसी सोच को केंद्र में रखते हुए भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान जोधपुर (IIT जोधपुर) के स्कूल ऑफ लिबरल आर्ट्स के सहायक प्रोफेसर डॉ. गुरूजेगन मुरुगेसन कम बोली जाने वाली और विरासत की भाषाओं पर शोध कर रहे हैं।

डॉ. मुरुगेसन का शोध उन भाषाओं और बोलियों पर केंद्रित है, जिनका इस्तेमाल सीमित संख्या में लोग करते हैं और जिनके धीरे-धीरे विलुप्त होने का खतरा बना हुआ है। उनका मानना है कि किसी भाषा के कमजोर होने का असर केवल बोलचाल पर नहीं पड़ता, बल्कि उसके साथ जुड़ी सांस्कृतिक परंपराएं, लोककथाएं, स्थानीय इतिहास और समुदाय का पारंपरिक ज्ञान भी प्रभावित होता है।शोध के माध्यम से ऐसी भाषाओं को समझने और उनके संरक्षण की संभावनाओं पर काम किया जा रहा है। इसमें भाषा के साथ-साथ उससे जुड़े सामाजिक और सांस्कृतिक पहलुओं को भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

किसी भी समुदाय की भाषा उसके सामूहिक अनुभवों का दस्तावेज होती है। इसमें पीढ़ियों से चला आ रहा स्थानीय ज्ञान, प्रकृति और पर्यावरण से जुड़ी समझ, सामाजिक रिश्तों की जानकारी और परंपराओं की झलक मिलती है। ऐसे में कम बोली जाने वाली भाषाओं का अध्ययन भाषाविज्ञान के साथ-साथ समाज और संस्कृति को समझने के लिए भी महत्वपूर्ण है।

डॉ. मुरुगेसन का शोध इस बात पर भी ध्यान केंद्रित करता है कि बदलते सामाजिक परिवेश, शिक्षा, रोजगार और आधुनिक संचार माध्यमों के कारण स्थानीय भाषाओं के इस्तेमाल में किस तरह बदलाव आ रहा है। युवा पीढ़ी के बीच इन भाषाओं के इस्तेमाल में कमी आने से कई भाषाओं के भविष्य को लेकर चिंता बढ़ी है।

भाषाओं के संरक्षण के लिए उनका दस्तावेजीकरण भी अहम माना जाता है। बोलने वालों से बातचीत, स्थानीय शब्दावली, लोककथाओं और सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों को दर्ज करके आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित किया जा सकता है।IIT जोधपुर में किया जा रहा यह शोध भाषा को केवल व्याकरण और शब्दों तक सीमित नहीं मानता, बल्कि उसे समुदाय की पहचान और सांस्कृतिक विरासत से जोड़कर देखता है। कम बोली जाने वाली भाषाओं पर इस तरह का अध्ययन भारत की भाषाई विविधता को समझने और उसे संरक्षित करने की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है।