हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: प्रदेश के 93 बजरी खनन पट्टों की लीज समाप्त, जनहित याचिका पर आया आदेश
प्रदेश में बजरी खनन को लेकर हाई कोर्ट ने बड़ा और अहम फैसला सुनाया है। राजस्थान हाई कोर्ट ने प्रदेश के 93 बजरी खनन पट्टों की लीज को समाप्त करने के आदेश दिए हैं। यह आदेश कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश एस.पी. शर्मा और जस्टिस संगीता शर्मा की खंडपीठ ने पारित किया। अदालत ने यह फैसला डॉ. बृजमोहन सपूत कला संस्कृति सेवा संस्थान द्वारा दायर जनहित याचिका को स्वीकार करते हुए सुनाया है।
जनहित याचिका में आरोप लगाया गया था कि प्रदेश में बजरी खनन के लिए जारी कई पट्टे पर्यावरणीय नियमों और सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों का उल्लंघन कर संचालित किए जा रहे हैं। याचिका में यह भी कहा गया कि अवैध और अनियंत्रित बजरी खनन से नदियों के अस्तित्व, पर्यावरण संतुलन और स्थानीय लोगों की सुरक्षा पर गंभीर खतरा पैदा हो रहा है।
मामले की सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने राज्य सरकार और संबंधित विभागों से विस्तृत जवाब मांगा था। अदालत के समक्ष यह तथ्य भी सामने आए कि कई खनन पट्टों को बिना आवश्यक पर्यावरणीय स्वीकृति और नियमों का पालन किए जारी किया गया था। इसके अलावा, नदियों में अत्यधिक खनन से जलस्तर गिरने, भू-क्षरण बढ़ने और आसपास के गांवों में खतरे की स्थिति उत्पन्न होने की बात भी रिकॉर्ड पर आई।
सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद खंडपीठ ने स्पष्ट रूप से कहा कि पर्यावरण संरक्षण सर्वोपरि है और इसके साथ किसी भी प्रकार का समझौता नहीं किया जा सकता। अदालत ने माना कि बजरी खनन से जुड़े मामलों में नियमों की अनदेखी की गई है, जो कानून और पर्यावरण दोनों के खिलाफ है। इसी आधार पर हाई कोर्ट ने प्रदेश के 93 बजरी खनन पट्टों की लीज समाप्त करने का आदेश जारी कर दिया।
हाई कोर्ट के इस फैसले को बजरी खनन से जुड़े कारोबारियों के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है। वहीं पर्यावरण संरक्षण से जुड़े संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस फैसले का स्वागत किया है। उनका कहना है कि यह आदेश नदियों और प्राकृतिक संसाधनों को बचाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
इस फैसले के बाद राज्य सरकार के लिए भी चुनौती बढ़ गई है। अब सरकार को वैकल्पिक व्यवस्था, नियमों के तहत नई नीति और पारदर्शी प्रक्रिया अपनाकर बजरी आपूर्ति सुनिश्चित करनी होगी, ताकि निर्माण कार्य प्रभावित न हों और अवैध खनन पर भी प्रभावी रोक लगाई जा सके।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला आने वाले समय में प्रदेश की खनन नीति को नई दिशा दे सकता है। साथ ही यह संदेश भी देता है कि पर्यावरणीय नियमों की अनदेखी करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई से कोई नहीं बच सकता।
