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मेघराजसर तालाब की पाल पर अवैध पट्टों के मामले में हाईकोर्ट सख्त, कलेक्टर और ईओ को नोटिस जारी

 
मेघराजसर तालाब की पाल पर अवैध पट्टों के मामले में हाईकोर्ट सख्त, कलेक्टर और ईओ को नोटिस जारी

Jodhpur स्थित Rajasthan High Court की जोधपुर मुख्यपीठ ने Phalodi जिले के बाप नगर पालिका क्षेत्र में स्थित ऐतिहासिक मेघराजसर तालाब की पाल पर नियमों के विरुद्ध पट्टे जारी किए जाने के मामले को गंभीरता से लिया है। अदालत ने इस प्रकरण पर सख्त रुख अपनाते हुए संबंधित अधिकारियों से जवाब तलब किया है।

मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति Pushpendra Singh Bhati और न्यायमूर्ति Sandeep Shah की खंडपीठ द्वारा की गई। सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि मेघराजसर तालाब की पाल जैसे संवेदनशील और ऐतिहासिक जलस्रोत क्षेत्र में कथित रूप से नियमों की अनदेखी कर पट्टे आवंटित किए गए हैं, जो पर्यावरणीय और प्रशासनिक दृष्टि से गंभीर विषय है।

हाईकोर्ट ने इस मामले को जनहित और पर्यावरण संरक्षण से जुड़ा मानते हुए सख्त टिप्पणी की और Rajasthan High Court ने Phalodi जिला कलेक्टर, नगर पालिका बाप के अधिशासी अधिकारी (ईओ) सहित अन्य संबंधित अधिकारियों को नोटिस जारी कर जवाब प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं।

याचिका में आरोप लगाया गया है कि मेघराजसर तालाब की पाल पर ऐसे पट्टे जारी किए गए हैं, जो न केवल नियमों के विपरीत हैं बल्कि जल संरचना और पर्यावरणीय संतुलन के लिए भी खतरा पैदा कर सकते हैं। तालाब जैसे जलस्रोतों के आसपास निर्माण और आवंटन पर स्पष्ट दिशानिर्देश होने के बावजूद इनका उल्लंघन किए जाने का दावा किया गया है।

अदालत ने प्रारंभिक सुनवाई में यह भी संकेत दिया कि यदि आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह प्रशासनिक लापरवाही का गंभीर मामला हो सकता है। इस प्रकार के मामलों में जलस्रोतों का संरक्षण सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए, क्योंकि ये न केवल स्थानीय पारिस्थितिकी के लिए महत्वपूर्ण हैं, बल्कि भविष्य में जल संकट को रोकने में भी अहम भूमिका निभाते हैं।

स्थानीय स्तर पर इस मामले के सामने आने के बाद प्रशासनिक हलकों में भी हलचल देखी जा रही है। नगर पालिका बाप और जिला प्रशासन की भूमिका पर सवाल उठने लगे हैं। अब सभी की नजरें अदालत में होने वाली अगली सुनवाई पर टिकी हैं, जहां संबंधित अधिकारी अपना पक्ष प्रस्तुत करेंगे।

फिलहाल अदालत ने स्पष्ट किया है कि मामले की पूरी जांच के बाद ही कोई अंतिम निर्णय लिया जाएगा, लेकिन शुरुआती तौर पर इसे गंभीर अनियमितता का मामला माना जा रहा है। यदि जांच में आरोप सिद्ध होते हैं, तो संबंधित अधिकारियों और जिम्मेदार पक्षों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

यह मामला न केवल प्रशासनिक जवाबदेही को लेकर महत्वपूर्ण माना जा रहा है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि किस तरह से ऐतिहासिक जलस्रोतों और सार्वजनिक संपत्तियों की सुरक्षा को लेकर न्यायपालिका सतर्क भूमिका निभा रही है।